Tuesday, 26 April 2016

डॉ सुलक्षणा अहलावत

नेता जी म्हारा छोटा सा काम करवा दयो। सरकारी स्कूलां कै थम तालै लगवा दयो।। मास्टरां का यू टोटा तै थारै प दूर होता कोण्या। बालकां की पढ़ाई की चिंता म्ह मैं सोता कोण्या। थमनै चिंता क्यूँ होवै थी थारा कोय रोता कोण्या। रोज रोज की लड़ाई म्ह होवै समझौता कोण्या। राड़ तै बाड़ आछी हो यू कहण पुगवा दयो।। मास्टरां प पढ़ाई तै न्यारे सारे काम करवाओ सो। मिड डे मील का चार्ज दे सब्जी खरीदवाओ सो। बना नौकर खाना खुवाये पाछै हाथ धुलवाओ सो। सौंप कै ग्रांट मास्टरां प सारा भवन बनवाओ सो। मास्टर बेचारां नै थम कोल्हू म्ह कै पिड़वा दयो।। पहल्याँ तै बीएलओ बन घर घर जा वोट बनावैं। फेर दोबारा घर घर जा कै पहचान पत्र पहोंचावैं। इलेक्शना म्ह लागै ड्यूटी मास्टर दूर दूर जावैं। फेर इलेक्शन होये पाछै मास्टर गिनती करवावैं। इन बेचारे मास्टरां नै थम फाँसी तुड़वा दयो।। सत्तर ढ़ाल के काम बेचारे मास्टर दिन रात करैं सं। कदे क्लर्क बन अधिकारियाँ धोरै मास्टर फिरैं सं। आरटीआई, डाक तैयार कर कर कागज भरैं सं। आँख मीच कै सारै फरमान मानै ये इतने डरैं सं। मास्टरां तै चपड़ासी इन नै थम बनवा दयो।। जितनै प्रयोग करने हो सं मास्टरां प करो सो। आपणी गलत नीतियाँ का दोष इन प धरो सो। कदे गरीबाँ के बालक पढ़ जावैं थम न्यू डरो सो। नीति समझ म्ह आगी क्यूँ ना खाली पद भरो सो। सच्चाई महकमे की सुलक्षणा प लिखवा दयो।। ©® डॉ सुलक्षणा अहलावत
स्वागत है तुम्हारा मेरी दोस्ती के संसार में, कभी कमी नहीं मिलेगी यहाँ तुम्हें प्यार में। कभी तन्हा नहीं पाओगे तुम खुद को यहाँ, तड़फ उठोगे तुम अकेलेपन के इंतजार में। दुनिया को भुला दोगे तुम आज के बाद, बदलाव महसूस करोगे अपने व्यवहार में। प्यार मोहब्बत की बातें करोगे हर पल तुम, जिंदगी का मजा है एक दूसरे के ऐतबार में। नफरत के लिए कोई जगह नहीं है यहाँ पर, पर देखना आनंद आएगा तुम्हें तकरार में। हर ख़ुशी हर गम को मिलकर बाँट लेंगे, एक दूजे का साथ नहीं छोड़ेंगे मझधार में। ना कसमें खानी होंगी, ना वादे करने होंगे, बस मोल ना लगा देना दोस्ती का बाजार में। कभी भी इम्तेहान ले लेना मेरी दोस्ती का, फर्क नहीं मिलेगा सुलक्षणा के विचार में। ©® डॉ सुलक्षणा अहलावत


राँझे क्यूँ जुल्म गुजारै, क्यूँ जीते जी मन्नै मारै, के ख़ता होई मेरे प क्यूँ तू बोलै ना। बाहर खड़ी मैं क्यूँ फाटक खोलै ना।। भावज मेरी नै राह रोकी फेर बी मैं आई, रोज की तरियां तेरी खातर दूध मैं ल्याई, खा ले दूध मलाई, जिगर मेरा छोलै ना।। के बात हुई राँझे तू खोल मन्नै बताता ना, औरां दिन की ढालाँ भीतर मन्नै बुलाता ना, लाड़ मेरे लड़ाता ना, क्यूँ आज सर नै रोलै ना।। किसने फुक मारी तेरे जो छो म्ह होरया स, बता दे राँझे मन आपणै म्ह के लकोरया स, के साच म्ह सोरया स, जो मेरी बात गोलै ना।। ना बोल्या तै रणबीर सिंह तै शिक़ात करूंगी, ईबे टोहुँ कुआँ जोहड़ राँझे डूब कै मैं मरूँगी, किसे तै ना डरूँगी, सुलक्षणा का मन डोलै ना।। ©® डॉ सुलक्षणा अहलावत

ला तेरा यू थोड़ ठिकाना स।। राँझे मेरी बात म्ह फर्क हरगज ना पावैगा, जाणु थी साच सुनदे कालजा हाल जावैगा, उस काणे के कर्मा म्ह मौज उड़ाना स। अर तेरे कर्मा म्ह राँझे धक्के खाना स।। के सोचै हीर तन्नै सारै जहान तै खोगी, भूल तेरी मोहब्बत वा अक्खण की होगी, धोखा करया उसकै आगै आना स। झूठ नहीं थूकै उसनै सारा ज़माना स।। मन म्ह शीलक हो बड़वासनी म्ह जा कै, गुरु रणबीर सिंह तेरा दर्द सुना दें गा कै, सुलक्षणा का काम राह बताना स। दूसरे की गेल्याँ के होवै धिंगताना स।। ©® डॉ सुलक्षणा अहलावत

ऐ वक़्त जरा धीरे धीरे चल, क्यों रहा है लोगों को छल, कुछ पता नहीं चलता है तेरा, कब आया कब गया निकल, तेरी ये एक अदा अखरती है, बड़े बड़ों को दे जाता है अक्ल, बहुत से लोग पछताते रहते हैं, उनके हाथों से तू गया फिसल, तेरी ताकत का पता है सबको, बड़े बड़ों का निकालता है बल, जब वक़्त का पहिया घूमता है, सब कुछ जाता है यहाँ बदल, एक ही गति से चलता रहता है, रुक नहीं सकता सत्य है अटल, हर एक है तेरे हाथों खिलौना, हर समस्या का है तेरे पास हल, तेरी नब्ज को पकड़ लेता है जो, वो होता नहीं जिंदगी में विफल, तेरी गति से चलने वाला यहाँ, हर एक इंसान हुआ है सफल, तेरे साथ साथ यहाँ चलने को, सुलक्षणा की कलम रही मचल, ©® डॉ सुलक्षणा अहलावत

धन्यवाद जी

बाकी रही ना गात म्ह आग लागी अंग अंग मै। जब तै सुनी तू जावैगी ब्याही काणे के संग मै।। मेरे तै मुँह मोड़ लिया बता के खता हुई मेरी, हीर बता मन्नै कौन सी बात ना पुगाई तेरी, डांगर चराये थारे मन्नै अर सही गाल भतेरी, काणा भाई बता बनाया साजन करी डूबाढ़ेरी, कितनी तौली बदल गयी देख कै रहग्या दंग मै।। आँसू बी ना लिकड़ते गया सुख नैन नीर मेरा, रह रह कै याद आवैगा वो खुवाणा खीर तेरा, कितै का ना रहा मैं, बता के बिगड़ा हीर तेरा, बुली की बात साची होई रोता रहग्या पीर तेरा, हाथ काँगना पैर राखड़ी बाँध भरी तू उमंग मै।। जिसी तन्नै करी हीरे र सारी तेरे आगै आवैगी, अक्खण के संग म्ह तू बी सुख तै ना रह पावैगी, दुनिया नै शक्ल आपणी किस ढालाँ दिखावैगी, दुनिया ताने मार कै हीरे तन्नै बेवफा बतावैगी, मैं तै चाल्या जाऊँगा गेरुं ना भंग तेरे रंग मै।। छोड़ कै तेरा ढारा इब बड़वासनी नै जाऊँगा, गुरु रणबीर सिंह नै जा कै सारा हाल बताऊंगा, के बीती दिल मेरे प उन नै सारा दर्द सुनाऊँगा, हीरे तेरी बेवफ़ाई मैं सुलक्षणा प लिखवाऊँगा, हीरे तू बी जाणै स कितना पा रहा सूं तंग मै।। ©® डॉ सुलक्षणा अहलावत

जुल्मी घूँघट देवर भाभी की बहस देवर- के होग्या दो दिन मैं क्यों घणा उप्पर नै मुह ठाया तनै।। भाभी-दुनिया मैं एक इन्सान मैं भी ढंग तैं जीवणा चाहया मनै।। देवर बता भाभी गाम की इज्जत यो घूंघट नहीं सुहावै क्यों रिवाज नीची नजर तैं जीने का आंख तैं आंख मिलावै क्यों उघाड़े सिर चालै गाम मैं सरेआम म्हारी नाक कटावै क्यों सीटी मारैं कुबध करैं हाथ भिरड़ां के छते तों लगावै क्यों बहू सजै ना घूंघट के बिना बिन बूझें तार बगाया तनै।। भाभी रिवाजां की घाल कै बेड़ी क्यों बिठा करड़ा डर राख्या दुभान्त जिन रिवाजां मैं उनका भरोटा सिर पै धर राख्या घूंघट का रिवाज घणा बैरी ईनै पंख म्हारा कुतर राख्या कान आंख नाक मुह बांधे ज्ञान दरवाजा बन्द कर राख्या घूंघट ज्ञान का दुश्मन होसै पढ़ लिख कै बेरा लाया मनै।। देवर क्यूकर ज्ञान का दुश्मन सै तूं किसनै घणी भका राखी सै तेरै अपनी बुद्धि सै कोन्या चाबी और किसे नै ला राखी सै घंूघट तार कै पूरे गाम मैं ईज्जत धूल मैं खिंडा राखी सै सारा गााम थू थू करता घर घर तेरी बात चला राखी सै उल्टे रिवाज चला गाम मैं यो कसूता तूफान मचाया तनै।। भाभी ब्याह तैं पहलम तेरे भाई तैं घूंघट की खोल करी थी कही और सोच समझल्यां उनै ब्याह की तोल करी थी मनै सारी बात साफ बताई इनै ल्हको कै रोल करी थी रणबीर सिंह गवाह म्हारा मनै कति नहीं मखौल करी थी साची साच बताई सारी देवर कति ना झूठ भकाया मनै।।


Friday, 22 April 2016

हरयाणा का माहौल

हरयाणा का माहौल 
एक बै  आदत  पड्ज्या तो छूटै  ना  कितने ए ताण  तुडाले ।।
मुश्किल  होज्या ऐब छुडाना चाहे कितनी ए कसम दुआले ।।
तम्बाकू की लत  होज्या तो कैंसर रोग की खुल ज्य़ा राही 
दमा  बढे और साँस रोग भी मचावै  बुढापे  के मैं तबाही  
खांसी बलगम तडकें ए तड़क  मानस नै खूबे ए रूआले ।।
दारू की लत का काम बुरा पूरे हरयाणा मैं छागी देखो 
माणस  की इस लत के कारण महिला दुःख पागी देखो 
गैंग रेप बढ़े हरयाणा मैं या गिरती साख कौन बचाले ।।
पर नारी की लत कसूती या घर परिवार बर्बाद करै   
महिला पुरुष के मीठे रिश्त्याँ मैं या कसूता खटास भरै 
नहीं छुटती लत माणस की कोए कितना ए समझाले ।।
ताश खेलन की लत बढ़ी हरयाने के गामाँ की गालाँ मैं 
जुए की लत कारण द्रोपदी का चीरहरण हुया दरबारां  मैं 
परम्परावादी रूढ़ीवादी नेता पुलिश अफसर रख वाले ।।
हरयाणा के लड़के लडकी कई लतां के शिकार हुए 
समाज सुधार की जरूरत घनी रणबीर के विचार हुए 
सते फरमाना दिल तैं तूं या रागनी ऊंचे सुर मैं गाले ।।

चन्द्र सिंह गढ़वाली

आज हम आजाद देश के नागरिक हैं । आजादी के बाद हमने बहुत कुछ् हासिल किया है । लेकिन वे लोग जिनकी वजह से हमने आजादी पाई , उनके विषय में हम ज्यादा नहीं जानते, न ही उनके त्याग और संघर्षों को जानते हैं । किसी प्राप्ति का मूल्य तभी आँका  जा सकता है जब हम उसके पीछे के बलिदान को समझें । देश के अनेकानेक लोग कई प्रकार से स्वतन्त्रता के लिए संघर्ष रत रहे । कुछ देशभग्ति  की पराकाष्ठा तक पहुँच गए और अमर हो गए पर अधिकांश देशभक्त कहीं किसानों को, कहीं फ़ौज के सिपाहियों को , कहीं हिन्दू मुस्लिम अवाम को संगठित करते हुए नींव के पत्थर बन गए । चन्द्र सिंह गढ़ वाली भी ऐसे सामान्य फ़ौजी थे जिन्होंने गढ़वाल रायफल्ज  का नेतृत्व करते हुए अंग्रेजों का हुकम मानने से इंकार कर दिया और अंग्रेजों की  हिन्दू मुस्लिम बंटवारे की निति को विफल करके लोगों को देशप्रेम का सन्देश दिया । अंग्रेज सरकार ने उनके साथ बहुत सख्ती बरती लेकिन वे देश के लिए लड़ते रहे ।आज के दौर में ऐसे जन नायकों की विरासत को समझना और उससे सबक लेना हमारी जरूरत है । उम्मीद है चन्द्र सिंह गढ़वाली का यह किस्सा सबको प्रेरित करेगा ।
रागनी --1
आजाद देश के वासी सोचो आजादी क्यूकर पाई देखो
जिन करकै आजाद हुए उनकी याद भुलाई देखो ।। 
उन शहीदों के बारे हमने रति भर भी ज्ञान नहीं
उनका त्याग और क़ुरबानी इन सबकी पहचान नहीं
उनका संघर्ष याद कराँ घनी तकलीफ ठाई  देखो।।
अनेकानेक लोग देश के जिनने अपना बलिदान दिया
भगत सिंह राजगुरु सुखदेव जीवन पूरा कुर्बान किया
हँसते हँसते देश की खातिर फांसी इन नै खाई देखो ।।
कितै संघर्ष की खातिर संतान किसानों का बनाया
कितै फ़ौज के सिपाहियों नै अपना देश प्रेम दिखाया
हिन्दू मुस्लिम एकता की नींव मजबूत बनाई देखो ।।
हिन्दू मुस्लिम एकता म्हारी अंग्रेजों नै तोड़ बगाई या
देश का बंटवारा करकै अपनी तुर्पी चाल चलायी या
इस बंटवारे के दुखों की नहीं होगी या भरपाई देखो ।।
इन अमर शहीदों मैं एक हुआ चन्द्र सिंह गढ़वाली
फ़ौज मैं बगावत की नींव सबकी साहमी थी डाली
रणबीर सिंह नै दिल लाके करी सै कविताई देखो ।।

अंग्रेजों नै घने जुलम कमाए अपना राज जमावान मैं
फूट गेरो तरज करो वर लाई न निति अपनावन  मैं
किसानों पर घने कसूते अंग्रेजों नै जुलम कमाए थे
कोहलू मैं पीड़ पीड़ मारे लगान उनके बढ़ाए थे
जगलों  की शरण लिया करते अपने पिंड छटवावन मैं
मजदूरों का बेहाल करया ढाका जमा उजाड़  दिया
मानचैस्टर आगै बढाया जलूस म्हारा लिकाड़ दिया
ढाका की आबादी घटगी माहिर मलमल बनावन मैं
युवा घने सताए गोरयां नै ये सारी सीम लाँघ गए
बंदर बाँट मचा देश मैं फेर रच घने ये सांग गए
पहली आजादी आली जंग लड़ी गयी थी सतावन मैं
ठारा सौ सतावन की जंग मैं देशी सेना बागी होगी
अंग्रेजों के हुए कान खड़े चचोत कालजै लगी होगी
रणबीर सिंह की कविताई हो सै  जनता जगावन मैं
रेप मैनिया 
यो रेप मैनिया क्यों म्हारे हरयाणा के मैं छाग्या रै ।।
पढ़ पढ़ कै हादसे रोजाना जी घणा दुःख पाग्या रै ।।
जिस कै  लागै वोहे जानै दूजा के जानै पीर पराई 
म्हारै भी दुःख नहीं होंता जब तक ना झेलै माँ जाई 
सर पर कै पानी गया समाज पूरा घबराग्या रै ।।
कुछ अत्याचार बढ़ाये परम्परावादी रिवाज नै रै 
बाकी कसर पूरी करदी  इस बाजारी समाज नै रै 
महिला बनाई भोग की वस्तु बुरा जमाना आग्या रै ।।
बदमाशों की देखी जा सफेदपोश बदमाश होग्या 
माहौल पूरे समाज का यो अपराधों के बीज बोग्या 
बाड़ खेत नै खाण लगी रूखाला मुंह काला कराग्या रै।।
रेपिस्ट उनकी जिन्दगी मैं ये जहर कसूता घोलें 
हिम्मत उन महिलाओं की जो इसके खिलाफ बोलें 
कहै रणबीर बारोने आला छोह मैं छंद बनाग्या रै ।।

Friday, 17 July 2015

मत बनो कसाई

मत बनो कसाई
मत बनो पिता कसाई हो तेरी बेटी मैं।।
बचपन मैं दुभांत करी,कोन्सा किसे कै बात जरी
भाई खावै दूध मलाई हो तेरी बेटी मैं।।
घी माता को एक धड़ी दस दिन मैं करी खड़ी
ठीकरे फोड़ मातम मनाई हो तेरी बेटी मैं।।
घी माता की दो धड़ी चालीस दिन सम्भाल बड़ी
दादी नै थाली बजाई हो तेरी बेटी मैं।।
महिला दुश्मन अपनी जाई की हालत भूरो और भरपाई की
सारी उल्टी सीख सिखाई हो तेरी बेटी मैं।।
पढ़ण खंदाया स्कूल मैं भाई नहीं कदे मेरी बारी आई
घर अन्दर मोस बिठाई हो तेरी बेटी मैं।।
बालकपन मैं ब्याह रचाया वारी मेरी समझ मैं आया
रणबीर सिंह की कविताई हो तेरी बेटी मैं।

एक फौजी की घरवाली की दास्तां

एक फौजी की घरवाली की दास्तां
तर्ज -कसमें वायदे प्यार वफा-
सोसाटी आला बाबू जी रोजाना फेरी मारै पिया।।
दारु पी कै घरनै आवै कुबध करण की धारै पिया।।
म्हारे घर अन्न वस्त्र का टोटा इतने जतन करैं फौजी
म्हारी जिन्दगी बीत गई हम टोटे के म्हां मरैं फौजी
लता कपड़ा नहीं औढ़ण नै जाड्डे के म्हां ठिरैं फौजी
बता जुलमी करजे का पेटा किस तरियां तैं भरैं फौजी
इस करजे की चिन्ता मनै शाम सबेरी मारै पिया।।
धरती सारी गहनै धरदी  दबा लिए हम करजे नै
जितने जेवर थे घर मैं सब बिकवा दिये करजे नै
रोटी कपड़े के मोहताज हम बना दिए करजे नै
चोरी के झूठे इल्जाम म्हारे पै लुवा दिए करजे नै
सोसाटी आला बाबू जी ईज्जत पै हाथ पसारै पिया।।
जहरी नाग फण ठारे कुए जोहड़ मैं पड़ना दीखै
और नहीं गुजारा चलै ज्यान का गाला करना दीखै
करजा म्हारा नाश करैगा बिजली बिल भरना दीखै
मारुं सैक्टरी नाश जले नै ना आप्पै ए मरना दीखै
आंख मूंदगे हीजड़े होगे वोतै गाम नै ललकारै पिया।।
गरीब की बहू जोरु सबकी या समझै दुनिया सारी
मेहनत तो लूट लई या ईब ईज्जत लूटण की त्यारी
सारा गाम बिलखै फौजी कड़ै गया वो क्ृष्ण मुरारी
रणबीर सिंह नै बरोने कै मैं खोल बताई या बीमारी
करिए ख्याल तावला मेरा प्रेम कौर खड़ी पुकारै पिया।।

जुल्मी घूँघट

जुल्मी घूँघट
देवर भाभी की बहस
देवर- के होग्या दो दिन मैं क्यों घणा उप्पर नै मुह ठाया तनै।।
भाभी-दुनिया मैं एक इन्सान मैं भी ढंग तैं जीवणा चाहया मनै।।
           देवर
      बता भाभी गाम की इज्जत यो घूंघट नहीं सुहावै क्यों
      रिवाज नीची नजर तैं जीने का आंख तैं आंख मिलावै क्यों
      उघाड़े सिर चालै गाम मैं सरेआम म्हारी नाक कटावै क्यों
      सीटी मारैं कुबध करैं हाथ भिरड़ां के छते तों लगावै क्यों
      बहू सजै ना घूंघट के बिना बिन बूझें तार बगाया तनै।।
           भाभी
      रिवाजां की घाल कै बेड़ी क्यों बिठा करड़ा डर राख्या
      दुभान्त जिन रिवाजां मैं उनका भरोटा सिर पै धर राख्या
      घूंघट का रिवाज घणा बैरी ईनै पंख म्हारा कुतर राख्या
      कान आंख नाक मुह बांधे ज्ञान दरवाजा बन्द कर राख्या
      घूंघट ज्ञान का दुश्मन होसै पढ़ लिख कै बेरा लाया मनै।।
             देवर
      क्यूकर ज्ञान का दुश्मन सै तूं किसनै घणी भका राखी सै
      तेरै अपनी बुद्धि सै कोन्या चाबी और किसे नै ला राखी सै
      घंूघट तार कै पूरे गाम मैं ईज्जत धूल मैं खिंडा राखी सै
      सारा गााम थू थू करता घर घर तेरी बात चला राखी सै
      उल्टे रिवाज चला गाम मैं यो कसूता तूफान मचाया तनै।।
            भाभी
       ब्याह तैं पहलम तेरे भाई तैं घूंघट की खोल करी थी
       कही और सोच समझल्यां उनै ब्याह की तोल करी थी
       मनै सारी बात साफ बताई इनै ल्हको कै रोल करी थी
       रणबीर सिंह गवाह म्हारा मनै कति नहीं मखौल करी थी
       साची साच बताई सारी देवर कति ना झूठ भकाया मनै।।


BAJE BHAGAT KI EK RAGNI



BAJE BHAGAT KI EK RAGNI
साची बात कहण म्हं सखी होया करै तकरार
दगाबाज बेरहम बहन ना मरदां का इतबार
रंगी थी सती प्रेम के रंग म्हं , साथ री बिपत रुप के रंग म्हं
दमयन्ती के संग म्हं किसा नल नै करया ब्यौहार
आधी रात छोड़ग्या बण मैं ल्हाज शरम दी तार
सखी सुण कै क्रोध जागता तन म्हं ,मरद जले करैं अन्धेरा दिन म्हं
चौदहा साल दुख भोगे बण म्हं, ना तज्या पिया का प्यार
फेर भी राम नैं काढ़ी घर तैं, वा सीता सतवन्ती नार
बात हमनै मरदां की पागी,घमन्ड गरुर करै मद भागी
बिना खोट अन्जना त्यागी , करया पवन नै अत्याचार
काग उडाणी बना दई , हुया इसा पवन पै भूत सवार
खोट सारा मरदां मैं पाया, शकुन्तला संग जुल्म कमाया
गन्धर्व ब्याह करवाया दुष्यन्त नै, कर लिए कौल करार
शकुन्तला ना घर मैं राखी, बण्या कौमी गद्यार

कौण साच्चा कौण झूठा

बस में रोजाना छेड़छाड़ की घटनाएं हो रही हैं। लड़कियों ने हिम्मत की मगर समाज को रास नहीं आई कमजोर तबकों की लड़कियों की बहादुरी।
कौण साच्चा कौण झूठा इसमैं बात सिमटा दई सारी।।
बसां मैं जो होवै दुर्गति इसकी चर्चा गई मूधी मारी।।
लड़कियां की पहल कदमी की बात उतरै नहीं गलै
सबनै बेरा हाल बसां का झेलै जब चढै कै उतरै तलै
डरती बोलती कोन्या कदे चरित्रहीनता की फांसी घलै
म्हारे प्रदेश की महिला पुरुषवादी आतंक के म्ंह पलै
दो छोरियां नै हिम्मत दिखाई संस्कृृति हा हा कार मचारी।।
माणस तो रेप करणिया के भी हक मैं समझौते खातर आवैं
महिला कैड़ खड़े होवण मैं ये सारे बड्डे चौधरी हिचकावैं
रेप का कसूरवार भी महिला नै किसे ना किसे ढ़ाल बतावैं
बिगडै़ल छोरयां नै मुश्किल तैं कदे कदे फंसी मैं बिसरावैं
विकृृत मानसिकता और समझ के आज हुए घणे प्रचारी।।
दबाया गया तबका कद ताहिं न्योंए दबकै सहवै भाई
भीतर आग बलै वा जलाकै सब क्यांहें नै रहवै भाई
कमजोर का साथ कौण दे यो समाज ठाडे नै लहवै भाई
घणी हिम्मत चाहिये जब कोए छोरी इसे ढालां फहवै भाई
पाछै सी दो छोरी फांसी खागी किननै उनकी बात बिचारी।।
कमजोरां पर अत्याचार होवैं समाज जात्यां मैं बंट ज्यावै
गलत सही का फैंसला भी पाले बन्दी के हिसाब तैं आवै
जात्यां तैं उपर उठकै नै जै कोए विवेक तैं बात नै बढ़ावै
उसकी कोए नहीं सुणकै राजी दूजे सुर मैं सुर मिलावै
इस किस्से मैं साच् कोर्ट छांटै बाकियां पै क्यों चुप्पी धारी।।

कौण साच्चा कौण झूठा

बस में रोजाना छेड़छाड़ की घटनाएं हो रही हैं। लड़कियों ने हिम्मत की मगर समाज को रास नहीं आई कमजोर तबकों की लड़कियों की बहादुरी।
कौण साच्चा कौण झूठा इसमैं बात सिमटा दई सारी।।
बसां मैं जो होवै दुर्गति इसकी चर्चा गई मूधी मारी।।
लड़कियां की पहल कदमी की बात उतरै नहीं गलै
सबनै बेरा हाल बसां का झेलै जब चढै कै उतरै तलै
डरती बोलती कोन्या कदे चरित्रहीनता की फांसी घलै
म्हारे प्रदेश की महिला पुरुषवादी आतंक के म्ंह पलै
दो छोरियां नै हिम्मत दिखाई संस्कृृति हा हा कार मचारी।।
माणस तो रेप करणिया के भी हक मैं समझौते खातर आवैं
महिला कैड़ खड़े होवण मैं ये सारे बड्डे चौधरी हिचकावैं
रेप का कसूरवार भी महिला नै किसे ना किसे ढ़ाल बतावैं
बिगडै़ल छोरयां नै मुश्किल तैं कदे कदे फंसी मैं बिसरावैं
विकृृत मानसिकता और समझ के आज हुए घणे प्रचारी।।
दबाया गया तबका कद ताहिं न्योंए दबकै सहवै भाई
भीतर आग बलै वा जलाकै सब क्यांहें नै रहवै भाई
कमजोर का साथ कौण दे यो समाज ठाडे नै लहवै भाई
घणी हिम्मत चाहिये जब कोए छोरी इसे ढालां फहवै भाई
पाछै सी दो छोरी फांसी खागी किननै उनकी बात बिचारी।।
कमजोरां पर अत्याचार होवैं समाज जात्यां मैं बंट ज्यावै
गलत सही का फैंसला भी पाले बन्दी के हिसाब तैं आवै
जात्यां तैं उपर उठकै नै जै कोए विवेक तैं बात नै बढ़ावै
उसकी कोए नहीं सुणकै राजी दूजे सुर मैं सुर मिलावै
इस किस्से मैं साच् कोर्ट छांटै बाकियां पै क्यों चुप्पी धारी।।

Saturday, 4 July 2015

हमारी बला से

ranbir dahiya - 4 October , 2009
HAMARI BALA SE
हमने तरक्की की है
किस कीमत पर हमारी बला से

ऊंची ऊंची इमारतें पाश इलाकों में

जहां पांच दस करोड़ लोग रहते हैं

एयर कंडीशंड घर हैं

गाडी भी एयर कंडीशंड

बाजार भी कंडीशंड
हो गये
हमारी क्या खता हम भी कंडीशंड
हो गये
फिर चाहे गरीबी बढ़ती है तो बढ़े
नब्बे करोड़ के मकान बरसात में टपकते रहें
हमारी बला से
कारपोरेट सैक्टर फ़ल फूल रहा है
अभी और भी फूलेगा
फिर चाहे बेरोज गारी बढ़ती है तो बढे
सल्फास की गोली किसान खा कर मरता है तो मरे
हमारी बला से |
हमारा आई टी उद्योग आसमान की ऊंचाईयां
छू रहा है क्या दिखाई नहीं देता
बदेश में बच्च घूमने जा रहे हैं
अच्छी खासी तनखा पा रहे हैं
फिर चाहे बहुत से लोग भूख से मरते हैं
तो मरें, हमारी बला से |
हमारा अपना बिजनेश है
कई माल हैं हमारे
पै सा करोड़ों से अरबों में हो गया

हमारे पास फोरन एक्सचेंज है
फिर चाहे छोटी छोटी किरयाना की दुकानें
बन्द होती हैं तो हमारी बला से
बहुत आधुनिक हैं हम
सभ्यता की सब सीमाएं
लांघ गए हैं हम
हमारे शरीरों पर कपड़े
कम से कम तर होरे जा रहे हैं
फिर चाहे कोई बिना कपड़े नंगा
घूम रहा है तो हमारी बला से |
एटम बम्ब है हमारे पास
मिसाइल है दूर मार की
अच्छी खासी फौज है हमारे पास
फिर चाहे सामाजिक असुरक्षा बढ़ती है तो
हमारी बला से |
पांच सितारा अस्पताल हैं
महान भारत देश में
मैड़ीकल टूरिज्म फल फूल रहा है
फिर चाहे लोग बिना ईलाज के मरते हैं
तो मरें
प्लेग फैलता है तो फैले
एड़ज दनदनाता है तो दनदनाए
वेश्यावर्ति बढ़ती है तो बढ़े
हमारी बला से |
आर्थिक स्तर पर गोवा के बाद है
हरियाणा
सेज बिछाई जा रही हैं तेजी से
फिर चाहे लिंग अनुपात में
सबसे नीचे है तो क्या?
हमारी बला से |
कुछ हथियार और हों कुछ
पैसा और हो
गोरक्षा हमारा धर्म है
फिर चाहे दलितों के घर
जलाए जाते हैं तो क्या!
मनुष्य मरते हैं तो मरते रहें
हमारी बला से |
हम २०२० तक दुनिया की
महाशकित बन सकते हैं
विकास की कीमत तो अदा करनी
ही पड़ेगी
आइड़ियोलोजीका जमाना गया
क्वालिटी जीवन का जमाना आया है
हमने तरक्की की है
किस कीमत पर
हमारी बला से |

रणबीर


धरती हमारी हुई है बाँझ

धरती हमारी हुई है बाँझ
किसान तपस्वी हुआ कंगाल
बणी सणी ख़त्म हो गयी
तथाकथित नेता रहे दंगाल
गाँव गाँव में दारू बिकती
घर घर में औरत पिटती
बैठे ये लोग ताश खेलते
महिला पर मजाक ठेलते
ना किसी से कोई काम है
कहता किस्में जयादा दम है
बदमाशों ने लंगोट घुमाया
राजनेता से हाथ मिलाया
भ्रष्ट पुलिस अफसर मिला है
भ्रष्ट ब्यूरोक्रेट साथ खड़ा है
चारों क़ि दोस्ती अब तय हैं
एक दूजे क़ि बोलेन जय हैं
लगा रहे हैं जोर पर जोर
चारों तरफ देखो बढ़ा शोर
बेरोजगारी का उठा भूचाल
किसान होते जा रहे बदहाल
ऊपर से नेताजी भी पुकारे
उस पठे को मज्जा चखारे
आगे बढ़के गलघोट लगादे
कहाँ पे पड़ेगी चोट बतादे
आज उसे कल उसे पटकदे
सामने बोले जो उसे झटकदे
याद छटी का दूध दिलाना
मत इसे हमारा नाम बताना
बता रहे दाँव पर दाँव देखो
नेताओं में है कांव कांव देखो
कुरीतियों पर चुप रहे कमान
आनर किलिंग समाज में श्यान
मारना और फिर मरना होगा
नाम गाँव का तो करना होगा
जनता तक रही है सांसें थाम
बताओ यूं चलेगा ये कैसे काम
हम बिना शादी के घूम रहे हैं
वे गोतों के नशे में झूम रहे हैं
वाह निकले हैं नहले पर दहले
कौन बोलेगा वहां सबसे पहले
खूब हुई देखो वहां धक्का पेल
पंचायत ने वहां दिखाया था खेल
अहम् सबका माइक पे टकराया
फैसला खास वहां हो नहीं पाया
पाँच घंटे तक मार पर मार हुई
झड़प आपस में बारम्बार हुई
ना दहेज़ पर बोला कोई वहां
दारू पर बंद रही सबकी जुबाँ
महिला भ्रूण हत्या को भूल गए
बस गोत्र शादी में सब झूल गए

 - 24,  april , 2010

राहगीर

ranbir dahiya - 16 de setembro de 2008
RAHGEER
चलते चलते जिन्दगी में मिला एक राहगीर मुझको||
मि ल बैठे कुछ बात हुई मन भाई तासीर मुझको||
कुछ तो था पर क्या था उसमें अब तक सोच रही
दिमाग लगाकर देखा साफ नहीं तसवीर मुझको||
उसका हंसना ही था जिसने मुझको बांध लिया
याद आती उसके पेहरे की एक एक लकीर मुझको||
कुछ पल मिल बैठे हम अपने दिलों में झांक सके थे
दरिया दिल इन्सान मिला बांध गया जंजीर मुझको||
कह नहीं सके एक दूजे को दिल की बात कभी हम
सुहानी यादों की दे गया खजाने की जागीर मुझको||
होन्डा के आन्दोलन में शहीद हो गया वो साथी
मैं समझूं या अनजान बनूं संदेश दिया गम्भीर मुझको||
साथ चले साथ हंसे थे साथ ही सितम झेले हमने

सम्भल के चलना यारो बता गया रणबीर मुझको||

बोझ उठाने वाले |

अब हालत बदलने होंगे ग़म का बोझ उठाने वाले |
वरना देते ही जायेंगे दुःख दिन रात ज़माने वाले |
मजलूमों को बाँट रहे हैं परम्पराओं के बहाने करके 
इस साजिस ही में शामिल हैं वे नफरत फ़ैलाने वाले |
दुनिया पर कब्ज़ा है जिन का वो उस के हक़दार नहीं हैं 
उनसे अब कब्ज़ा छीनेंगे  सब का बोझ उठाने वाले |
पत्थर दिल लोगों से अपने जख्मों को ढांपे ही रखो
खुद को हल्का कर लेते हैं सबको जख्म दिखाने वाले |
कोई किसी का साथ निभाए इतनी फुर्सत ही किसको है 
अफसानों में मिल सकते हैं अब तो साथ निभाने वाले  

रिमझिम

Saturday, 30 May 2015

खेल मीडिया   का
मीडिया एक इसा बाजार तंत्र सै जिसकी दिशा निर्धारित करी जावै सै अर इसकी या दिशा लाभ मतलब मुनाफा ए या दिशा तय करै सै | मीडिया का मालिक मीडिया की विषय वस्तु मतलब इसकी सामग्री नै तय करै सै | लोगां कै  कोए  बात जंचावन की खातिर यो मीडिया खास ढंग तैं प्रोपगंडा कहो या प्रचार कहो करै सै | मीडिया की तासीर समझान की खातिर कई  छालनीयाँ महँ कै छानना पडै  सै | 
पहली छालनी सै पीस्सा ------ मालिक का पीस्सा मीडिया मैं ला गै सै | उसका मकसद सै लाभ कमाना | मीडिया के मालिक घने ओन्य क्योंकी यूं बड़े धन्ना से ठों  का खेल सै   जो घने कोन्या | कम्पीटीसन माडा काम सै इस धंधे मैं | 
दूसरी छालनी सै विज्ञापन ------ आमदनी का तगड़ा साधन सै विज्ञापन | विज्ञापन पीस्सा तो कमा वै ए सै फेर और के के गुल खिलावै  सै या न्यारी बात सै | इस्पे फेर कदे सही |
तीसरी छालणी सै जानकारी अर उस पै भरोसा ---- या जानकारी , सरकार व्यवसाय और विशेषज्ञ  की तिकड़ी मिलके बनै सै | 

साथ तुम्हारा इन्कलाब नारा इस कदर भा गया 
मकसद वीरान जिन्दगी का जैसे फिर से पा गया 
मोम के घरों में बैठे लोग हमारे घर जलाने आये 
जला दिए हमारे मग़र अपने भी ना बचा पाये 
तबाह कर दिया जहान को मुनाफा हमें खा गया 
रास्ता ही गल्त पकड़ा हमें भी उसी पर चलाया है 
स्वर्ग नर्क के पचड़े में तुम्हीं ने हमको  फंसाया है  
भगवान और बाबाओं का खेल समझ में आ गया 
आशा बाबू एक  प्रवचन के कई लाख कमाते हैं 
निर्मल बाबू नकली लोग पैसे दे कर के  बुलाते हैं 
भगवान की आड़ में मुनाफा दुनिया पर छा गया 

फागन

फागन का महीना आ जता है | फ़ौजी को छुटी नहीं मिलती | तो उसकी घरवाली उसको कैसे संबोधन करती है 

मनै पाट्या कोन्या तोलक्यों करदी तनै बोल
नहीं गेरी चिठ्ठी  खोलक्यों सै छुट्टी मैं रोळ
मेरा फागण करै मखोलबाट तेरी सांझ तड़कै।।

या आई फसल पकाई पैदुनिया जावै  लाई पै
लागै दिल मेरे पै चोटक्यूकर ल्यूं  इसनै ओट
सोचूं खाट के मैं लोटतूं कित सोग्या पड़कै।।

खेतां मैं मेहनत करकैरंज फिकर यो न्यारा धरकै
लुगाइयां नै रोनक लाई_ी हो बुलावण आई
मेरी कोन्या पार बसाईतनै कसक कसूती लाई
पहली दुलहण्डी याद आईमेरा दिल कसूता धड़कै।।

इसी किसी तेरी नौकरीकुणसी अड़चन तनै रोकरी
अमीरां के त्योहार घणे सैंम्हारे तो एकाध बणे सैं
खेलैं रळकै सभी जणे सैंबाल्टी लेकै मरद ठणे सैं
मेरे रोंगटे खड़े तनै सैंआज्या अफसर तै लड़कै।।

मारैं कोलड़े आंख मीचकैखेलैं फागण जाड़ भींचकै
उड़ै आग्या था सारा गामपड़ै था थोड़ा घणा घाम
पाणी के भरे खूब ड्रामदो तीन थे जमा बेलगाम
मनै लिया कोलड़ा थाममारया आया जो जड़कै।।

पहल्यां आळी ना धाक रहीना बीरां की खुराक रही
तनै मैं नई बात बताऊंडरती सी यो जिकर चलाऊं
रणबीर पै बी लिखवाऊंहोवे पिटाई हर रोज दिखाऊं
कुण कुण सै सारी गिणवाऊंनहीं खड़ी होती अड़कै।।


हाल किसान का

हाल किसान का 
अँधेरा दीखै चारों कांही कद आवैगा म्हारा सबेरा ॥ 
तीजा अध्यादेश कहते यो खोलै किसान का घेरा ॥ 

ट्रेक्टर की बाही मारै  ट्यूबवैल का रेट  सतावै
थ्रेशर की कढ़ाई मारै  भा फसल का ना थ्यावै
फल सब्जी ढूध  सीत सब ढोलां मैं घल ज्यावै
माटी गेल्याँ माटी होकै बी सुख का साँस ना आवै
बैंक मैं सारी धरती जाली दीख्या चारों कूट अँधेरा॥ 
तीजा अध्यादेश कहते यो खोलै किसान का घेरा ॥ 
 
निहाले पै रमलू तीन रूपया सैकड़े पै ल्यावै
वो साँझ नै रमलू धोरे दारू पीवन नै आवै
निहाला कर्ज की दाब मैं बदफेली करना चाहवै
विरोध करया तो रोज पीस्याँ की दाब लगावै
बैंक अल्यां की जीप का बी रोजाना लग्या फेरा॥ 
तीजा अध्यादेश कहते यो खोलै किसान का घेरा ॥ 

बेटा बिन ब्याह हाँडै सै घर मैं बैठी बेटी कंवारी
रमली रमलू नयों बतलाये मुशीबत कट्ठी  होगी सारी 
खाद बीज नकली मिलते होगी ख़त्म सब्सिडी  म्हारी
माँ टी बी की बीमार होगी बाबू कै दमे  की बीमारी
रौशनी कितै दीखती कोन्या घर मैं टोटे का डेरा॥ 
तीजा अध्यादेश कहते यो खोलै किसान का घेरा ॥ 
 
माँ अर बाबू म्हारे  नै  यो जहर धुर की नींद सवाग्या
माहरे घर का जो हाल हुआ वो सबके साहमी आग्या  
जहर क्यूं खाया उनने यो सवाल कचौट कै खाग्या   
म्हारी कष्ट कमाई उप्पर कोए दूजा दा क्यों लाग्या
कर्जा बढ़ता गया म्हारा मरग्या रणबीर सिंह कमेरा ॥ 
 तीजा अध्यादेश कहते यो खोलै किसान का घेरा ॥ 
 

Saturday, 16 May 2015

जाट आरक्षण


जाट आरक्षण पर सारे जाटां कै सांस चढ़ा राखे ॥
जीते पाच्छै देऊँ आरक्षण न्यों भोले जाट भका राखे ॥
जाट कौम हरयाणा की आज दबंग कौम कहावै
गुजर हीर सिख अपने नै नहीं कम कति बतावै
बैकवर्ड और जाट आज आरक्षण पै भिड़ा राखे ॥
जीते पाच्छै देऊँ आरक्षण न्यों भोले जाट भका राखे ॥
गंभीर सुझाव सै सुणियो ध्यान लगाकै बात मेरी
दलितां का रहवै सुणियो कान लगाकै बात मेरी
बैकवर्ड का रहवै वोहे जो भी आज दिखा राखे ॥
जीते पाच्छै देऊँ आरक्षण न्यों भोले जाट भका राखे ॥
बाकी बची कौमां मैं यो इसका आर्थिक आधार हो
जाट भी शामिल हों इसमेँ संविधान मैं सुधार हो
काला धन भुला दिया आरक्षण के टांड पै बिठा राखे ॥
जीते पाच्छै देऊँ आरक्षण न्यों भोले जाट भका राखे ॥
सारी कौम होकै कठ्ठी इसपै एक मत हो ज्यावां
दस प्रतिशत खातर या संविधान  मैं बदल करावां
रणबीर रोजगार खोसकै आरक्षण पै लड़ा राखे ॥
जीते पाच्छै देऊँ आरक्षण न्यों भोले जाट भका राखे ॥