Saturday, 4 July 2015

हमारी बला से

ranbir dahiya - 4 October , 2009
HAMARI BALA SE
हमने तरक्की की है
किस कीमत पर हमारी बला से

ऊंची ऊंची इमारतें पाश इलाकों में

जहां पांच दस करोड़ लोग रहते हैं

एयर कंडीशंड घर हैं

गाडी भी एयर कंडीशंड

बाजार भी कंडीशंड
हो गये
हमारी क्या खता हम भी कंडीशंड
हो गये
फिर चाहे गरीबी बढ़ती है तो बढ़े
नब्बे करोड़ के मकान बरसात में टपकते रहें
हमारी बला से
कारपोरेट सैक्टर फ़ल फूल रहा है
अभी और भी फूलेगा
फिर चाहे बेरोज गारी बढ़ती है तो बढे
सल्फास की गोली किसान खा कर मरता है तो मरे
हमारी बला से |
हमारा आई टी उद्योग आसमान की ऊंचाईयां
छू रहा है क्या दिखाई नहीं देता
बदेश में बच्च घूमने जा रहे हैं
अच्छी खासी तनखा पा रहे हैं
फिर चाहे बहुत से लोग भूख से मरते हैं
तो मरें, हमारी बला से |
हमारा अपना बिजनेश है
कई माल हैं हमारे
पै सा करोड़ों से अरबों में हो गया

हमारे पास फोरन एक्सचेंज है
फिर चाहे छोटी छोटी किरयाना की दुकानें
बन्द होती हैं तो हमारी बला से
बहुत आधुनिक हैं हम
सभ्यता की सब सीमाएं
लांघ गए हैं हम
हमारे शरीरों पर कपड़े
कम से कम तर होरे जा रहे हैं
फिर चाहे कोई बिना कपड़े नंगा
घूम रहा है तो हमारी बला से |
एटम बम्ब है हमारे पास
मिसाइल है दूर मार की
अच्छी खासी फौज है हमारे पास
फिर चाहे सामाजिक असुरक्षा बढ़ती है तो
हमारी बला से |
पांच सितारा अस्पताल हैं
महान भारत देश में
मैड़ीकल टूरिज्म फल फूल रहा है
फिर चाहे लोग बिना ईलाज के मरते हैं
तो मरें
प्लेग फैलता है तो फैले
एड़ज दनदनाता है तो दनदनाए
वेश्यावर्ति बढ़ती है तो बढ़े
हमारी बला से |
आर्थिक स्तर पर गोवा के बाद है
हरियाणा
सेज बिछाई जा रही हैं तेजी से
फिर चाहे लिंग अनुपात में
सबसे नीचे है तो क्या?
हमारी बला से |
कुछ हथियार और हों कुछ
पैसा और हो
गोरक्षा हमारा धर्म है
फिर चाहे दलितों के घर
जलाए जाते हैं तो क्या!
मनुष्य मरते हैं तो मरते रहें
हमारी बला से |
हम २०२० तक दुनिया की
महाशकित बन सकते हैं
विकास की कीमत तो अदा करनी
ही पड़ेगी
आइड़ियोलोजीका जमाना गया
क्वालिटी जीवन का जमाना आया है
हमने तरक्की की है
किस कीमत पर
हमारी बला से |

रणबीर


धरती हमारी हुई है बाँझ

धरती हमारी हुई है बाँझ
किसान तपस्वी हुआ कंगाल
बणी सणी ख़त्म हो गयी
तथाकथित नेता रहे दंगाल
गाँव गाँव में दारू बिकती
घर घर में औरत पिटती
बैठे ये लोग ताश खेलते
महिला पर मजाक ठेलते
ना किसी से कोई काम है
कहता किस्में जयादा दम है
बदमाशों ने लंगोट घुमाया
राजनेता से हाथ मिलाया
भ्रष्ट पुलिस अफसर मिला है
भ्रष्ट ब्यूरोक्रेट साथ खड़ा है
चारों क़ि दोस्ती अब तय हैं
एक दूजे क़ि बोलेन जय हैं
लगा रहे हैं जोर पर जोर
चारों तरफ देखो बढ़ा शोर
बेरोजगारी का उठा भूचाल
किसान होते जा रहे बदहाल
ऊपर से नेताजी भी पुकारे
उस पठे को मज्जा चखारे
आगे बढ़के गलघोट लगादे
कहाँ पे पड़ेगी चोट बतादे
आज उसे कल उसे पटकदे
सामने बोले जो उसे झटकदे
याद छटी का दूध दिलाना
मत इसे हमारा नाम बताना
बता रहे दाँव पर दाँव देखो
नेताओं में है कांव कांव देखो
कुरीतियों पर चुप रहे कमान
आनर किलिंग समाज में श्यान
मारना और फिर मरना होगा
नाम गाँव का तो करना होगा
जनता तक रही है सांसें थाम
बताओ यूं चलेगा ये कैसे काम
हम बिना शादी के घूम रहे हैं
वे गोतों के नशे में झूम रहे हैं
वाह निकले हैं नहले पर दहले
कौन बोलेगा वहां सबसे पहले
खूब हुई देखो वहां धक्का पेल
पंचायत ने वहां दिखाया था खेल
अहम् सबका माइक पे टकराया
फैसला खास वहां हो नहीं पाया
पाँच घंटे तक मार पर मार हुई
झड़प आपस में बारम्बार हुई
ना दहेज़ पर बोला कोई वहां
दारू पर बंद रही सबकी जुबाँ
महिला भ्रूण हत्या को भूल गए
बस गोत्र शादी में सब झूल गए

 - 24,  april , 2010

राहगीर

ranbir dahiya - 16 de setembro de 2008
RAHGEER
चलते चलते जिन्दगी में मिला एक राहगीर मुझको||
मि ल बैठे कुछ बात हुई मन भाई तासीर मुझको||
कुछ तो था पर क्या था उसमें अब तक सोच रही
दिमाग लगाकर देखा साफ नहीं तसवीर मुझको||
उसका हंसना ही था जिसने मुझको बांध लिया
याद आती उसके पेहरे की एक एक लकीर मुझको||
कुछ पल मिल बैठे हम अपने दिलों में झांक सके थे
दरिया दिल इन्सान मिला बांध गया जंजीर मुझको||
कह नहीं सके एक दूजे को दिल की बात कभी हम
सुहानी यादों की दे गया खजाने की जागीर मुझको||
होन्डा के आन्दोलन में शहीद हो गया वो साथी
मैं समझूं या अनजान बनूं संदेश दिया गम्भीर मुझको||
साथ चले साथ हंसे थे साथ ही सितम झेले हमने

सम्भल के चलना यारो बता गया रणबीर मुझको||

बोझ उठाने वाले |

अब हालत बदलने होंगे ग़म का बोझ उठाने वाले |
वरना देते ही जायेंगे दुःख दिन रात ज़माने वाले |
मजलूमों को बाँट रहे हैं परम्पराओं के बहाने करके 
इस साजिस ही में शामिल हैं वे नफरत फ़ैलाने वाले |
दुनिया पर कब्ज़ा है जिन का वो उस के हक़दार नहीं हैं 
उनसे अब कब्ज़ा छीनेंगे  सब का बोझ उठाने वाले |
पत्थर दिल लोगों से अपने जख्मों को ढांपे ही रखो
खुद को हल्का कर लेते हैं सबको जख्म दिखाने वाले |
कोई किसी का साथ निभाए इतनी फुर्सत ही किसको है 
अफसानों में मिल सकते हैं अब तो साथ निभाने वाले  

रिमझिम

Saturday, 30 May 2015

खेल मीडिया   का
मीडिया एक इसा बाजार तंत्र सै जिसकी दिशा निर्धारित करी जावै सै अर इसकी या दिशा लाभ मतलब मुनाफा ए या दिशा तय करै सै | मीडिया का मालिक मीडिया की विषय वस्तु मतलब इसकी सामग्री नै तय करै सै | लोगां कै  कोए  बात जंचावन की खातिर यो मीडिया खास ढंग तैं प्रोपगंडा कहो या प्रचार कहो करै सै | मीडिया की तासीर समझान की खातिर कई  छालनीयाँ महँ कै छानना पडै  सै | 
पहली छालनी सै पीस्सा ------ मालिक का पीस्सा मीडिया मैं ला गै सै | उसका मकसद सै लाभ कमाना | मीडिया के मालिक घने ओन्य क्योंकी यूं बड़े धन्ना से ठों  का खेल सै   जो घने कोन्या | कम्पीटीसन माडा काम सै इस धंधे मैं | 
दूसरी छालनी सै विज्ञापन ------ आमदनी का तगड़ा साधन सै विज्ञापन | विज्ञापन पीस्सा तो कमा वै ए सै फेर और के के गुल खिलावै  सै या न्यारी बात सै | इस्पे फेर कदे सही |
तीसरी छालणी सै जानकारी अर उस पै भरोसा ---- या जानकारी , सरकार व्यवसाय और विशेषज्ञ  की तिकड़ी मिलके बनै सै | 

साथ तुम्हारा इन्कलाब नारा इस कदर भा गया 
मकसद वीरान जिन्दगी का जैसे फिर से पा गया 
मोम के घरों में बैठे लोग हमारे घर जलाने आये 
जला दिए हमारे मग़र अपने भी ना बचा पाये 
तबाह कर दिया जहान को मुनाफा हमें खा गया 
रास्ता ही गल्त पकड़ा हमें भी उसी पर चलाया है 
स्वर्ग नर्क के पचड़े में तुम्हीं ने हमको  फंसाया है  
भगवान और बाबाओं का खेल समझ में आ गया 
आशा बाबू एक  प्रवचन के कई लाख कमाते हैं 
निर्मल बाबू नकली लोग पैसे दे कर के  बुलाते हैं 
भगवान की आड़ में मुनाफा दुनिया पर छा गया 

फागन

फागन का महीना आ जता है | फ़ौजी को छुटी नहीं मिलती | तो उसकी घरवाली उसको कैसे संबोधन करती है 

मनै पाट्या कोन्या तोलक्यों करदी तनै बोल
नहीं गेरी चिठ्ठी  खोलक्यों सै छुट्टी मैं रोळ
मेरा फागण करै मखोलबाट तेरी सांझ तड़कै।।

या आई फसल पकाई पैदुनिया जावै  लाई पै
लागै दिल मेरे पै चोटक्यूकर ल्यूं  इसनै ओट
सोचूं खाट के मैं लोटतूं कित सोग्या पड़कै।।

खेतां मैं मेहनत करकैरंज फिकर यो न्यारा धरकै
लुगाइयां नै रोनक लाई_ी हो बुलावण आई
मेरी कोन्या पार बसाईतनै कसक कसूती लाई
पहली दुलहण्डी याद आईमेरा दिल कसूता धड़कै।।

इसी किसी तेरी नौकरीकुणसी अड़चन तनै रोकरी
अमीरां के त्योहार घणे सैंम्हारे तो एकाध बणे सैं
खेलैं रळकै सभी जणे सैंबाल्टी लेकै मरद ठणे सैं
मेरे रोंगटे खड़े तनै सैंआज्या अफसर तै लड़कै।।

मारैं कोलड़े आंख मीचकैखेलैं फागण जाड़ भींचकै
उड़ै आग्या था सारा गामपड़ै था थोड़ा घणा घाम
पाणी के भरे खूब ड्रामदो तीन थे जमा बेलगाम
मनै लिया कोलड़ा थाममारया आया जो जड़कै।।

पहल्यां आळी ना धाक रहीना बीरां की खुराक रही
तनै मैं नई बात बताऊंडरती सी यो जिकर चलाऊं
रणबीर पै बी लिखवाऊंहोवे पिटाई हर रोज दिखाऊं
कुण कुण सै सारी गिणवाऊंनहीं खड़ी होती अड़कै।।


हाल किसान का

हाल किसान का 
अँधेरा दीखै चारों कांही कद आवैगा म्हारा सबेरा ॥ 
तीजा अध्यादेश कहते यो खोलै किसान का घेरा ॥ 

ट्रेक्टर की बाही मारै  ट्यूबवैल का रेट  सतावै
थ्रेशर की कढ़ाई मारै  भा फसल का ना थ्यावै
फल सब्जी ढूध  सीत सब ढोलां मैं घल ज्यावै
माटी गेल्याँ माटी होकै बी सुख का साँस ना आवै
बैंक मैं सारी धरती जाली दीख्या चारों कूट अँधेरा॥ 
तीजा अध्यादेश कहते यो खोलै किसान का घेरा ॥ 
 
निहाले पै रमलू तीन रूपया सैकड़े पै ल्यावै
वो साँझ नै रमलू धोरे दारू पीवन नै आवै
निहाला कर्ज की दाब मैं बदफेली करना चाहवै
विरोध करया तो रोज पीस्याँ की दाब लगावै
बैंक अल्यां की जीप का बी रोजाना लग्या फेरा॥ 
तीजा अध्यादेश कहते यो खोलै किसान का घेरा ॥ 

बेटा बिन ब्याह हाँडै सै घर मैं बैठी बेटी कंवारी
रमली रमलू नयों बतलाये मुशीबत कट्ठी  होगी सारी 
खाद बीज नकली मिलते होगी ख़त्म सब्सिडी  म्हारी
माँ टी बी की बीमार होगी बाबू कै दमे  की बीमारी
रौशनी कितै दीखती कोन्या घर मैं टोटे का डेरा॥ 
तीजा अध्यादेश कहते यो खोलै किसान का घेरा ॥ 
 
माँ अर बाबू म्हारे  नै  यो जहर धुर की नींद सवाग्या
माहरे घर का जो हाल हुआ वो सबके साहमी आग्या  
जहर क्यूं खाया उनने यो सवाल कचौट कै खाग्या   
म्हारी कष्ट कमाई उप्पर कोए दूजा दा क्यों लाग्या
कर्जा बढ़ता गया म्हारा मरग्या रणबीर सिंह कमेरा ॥ 
 तीजा अध्यादेश कहते यो खोलै किसान का घेरा ॥ 
 

Saturday, 16 May 2015

जाट आरक्षण


जाट आरक्षण पर सारे जाटां कै सांस चढ़ा राखे ॥
जीते पाच्छै देऊँ आरक्षण न्यों भोले जाट भका राखे ॥
जाट कौम हरयाणा की आज दबंग कौम कहावै
गुजर हीर सिख अपने नै नहीं कम कति बतावै
बैकवर्ड और जाट आज आरक्षण पै भिड़ा राखे ॥
जीते पाच्छै देऊँ आरक्षण न्यों भोले जाट भका राखे ॥
गंभीर सुझाव सै सुणियो ध्यान लगाकै बात मेरी
दलितां का रहवै सुणियो कान लगाकै बात मेरी
बैकवर्ड का रहवै वोहे जो भी आज दिखा राखे ॥
जीते पाच्छै देऊँ आरक्षण न्यों भोले जाट भका राखे ॥
बाकी बची कौमां मैं यो इसका आर्थिक आधार हो
जाट भी शामिल हों इसमेँ संविधान मैं सुधार हो
काला धन भुला दिया आरक्षण के टांड पै बिठा राखे ॥
जीते पाच्छै देऊँ आरक्षण न्यों भोले जाट भका राखे ॥
सारी कौम होकै कठ्ठी इसपै एक मत हो ज्यावां
दस प्रतिशत खातर या संविधान  मैं बदल करावां
रणबीर रोजगार खोसकै आरक्षण पै लड़ा राखे ॥
जीते पाच्छै देऊँ आरक्षण न्यों भोले जाट भका राखे ॥

Friday, 15 May 2015

सुखदेव की जीवनी


सुखदेव  जन्म- 15 मई1907पंजाब; शहादत- 23 मार्च1931, सेंट्रल जेल, लाहौर) को भारत के उन प्रसिद्ध क्रांतिकारियों और शहीदों में गिना जाता है, जिन्होंने अल्पायु में ही देश के लिए शहादत दी। सुखदेव का पूरा नाम 'सुखदेव थापर' था। देश के और दो अन्य क्रांतिकारियों- भगत सिंह और राजगुरु के साथ उनका नाम जोड़ा जाता है। ये तीनों ही देशभक्त क्रांतिकारी आपस में अच्छे मित्र और देश की आजादी के लिए अपना सर्वत्र न्यौछावर कर देने वालों में से थे। 23 मार्च, 1931 को भारत के इन तीनों वीर नौजवानों को एक साथ फ़ाँसी दी गई।

जन्म तथा परिवार

सुखदेव का जन्म 15 मई, 1907 को गोपरा, लुधियाना, पंजाब में हुआ था। उनके पिता का नाम रामलाल थापर था, जो अपने व्यवसाय के कारण लायलपुर (वर्तमान फैसलाबाद, पाकिस्तान) में रहते थे। इनकी माता रल्ला देवी धार्मिक विचारों की महिला थीं। दुर्भाग्य से जब सुखदेव तीन वर्ष के थे, तभी इनके पिताजी का देहांत हो गया। इनका लालन-पालन इनके ताऊ लाला अचिन्त राम ने किया। वे आर्य समाज से प्रभावित थे तथा समाज सेवा व देशभक्तिपूर्ण कार्यों में अग्रसर रहते थे। इसका प्रभाव बालक सुखदेव पर भी पड़ा। जब बच्चे गली-मोहल्ले में शाम को खेलते तो सुखदेव अस्पृश्य कहे जाने वाले बच्चों को शिक्षा प्रदान करते थे।

भगत सिंह से मित्रता

सन 1919 में हुए जलियाँवाला बाग़ के भीषण नरसंहार के कारण देश में भय तथा उत्तेजना का वातावरण बन गया था। इस समय सुखदेव 12 वर्ष के थे। पंजाब के प्रमुख नगरों में मार्शल लॉ लगा दिया गया था। स्कूलों तथा कालेजों में तैनात ब्रिटिश अधिकारियों को भारतीय छात्रों को 'सैल्यूट' करना पड़ता था। लेकिन सुखदेव ने दृढ़तापूर्वक ऐसा करने से मना कर दिया, जिस कारण उन्हें मार भी खानी पड़ी। लायलपुर के सनातन धर्म हाईस्कूल से मैट्रिक पास कर सुखदेव ने लाहौर के नेशनल कालेज में प्रवेश लिया। यहाँ पर सुखदेव की भगत सिंह से भेंट हुई। दोनों एक ही राह के पथिक थे, अत: शीघ्र ही दोनों का परिचय गहरी दोस्ती में बदल गया। दोनों ही अत्यधिक कुशाग्र और देश की तत्कालीन समस्याओं पर विचार करने वाले थे। इन दोनों के इतिहास के प्राध्यापक 'जयचन्द्र विद्यालंकार' थे, जो कि इतिहास को बड़ी देशभक्तिपूर्ण भावना से पढ़ाते थे। विद्यालय के प्रबंधक भाई परमानन्द भी जाने-माने क्रांतिकारी थे। वे भी समय-समय पर विद्यालयों में राष्ट्रीय चेतना जागृत करते थे। यह विद्यालय देश के प्रमुख विद्वानों के एकत्रित होने का केन्द्र था तथा उनके भी यहाँ भाषण होते रहते थे।

क्रांतिकारी जीवन 

वर्ष 1926 में लाहौर में 'नौजवान भारत सभा' का गठन हुआ। इसके मुख्य योजक सुखदेव, भगत सिंह, यशपाल, भगवती चरण व जयचन्द्र विद्यालंकार थे। 'असहयोग आन्दोलन' की विफलता के पश्चात 'नौजवान भारत सभा' ने देश के नवयुवकों का ध्यान आकृष्ट किया। प्रारम्भ में इनके कार्यक्रम नौतिक, साहित्यिक तथा सामाजिक विचारों पर विचार गोष्ठियाँ करना, स्वदेशी वस्तुओं, देश की एकता, सादा जीवन, शारीरिक व्यायाम तथा भारतीय संस्कृति तथा सभ्यता पर विचार आदि करना था। इसके प्रत्येक सदस्य को शपथ लेनी होती थी कि वह देश के हितों को सर्वोपरि स्थान देगा। परन्तु कुछ मतभेदों के कारण इसकी अधिक गतिविधि न हो सकी। अप्रैल, 1928 में इसका पुनर्गठन हुआ तथा इसका नाम 'नौजवान भारत सभा' ही रखा गया तथा इसका केन्द्र अमृतसर बनाया गया।

Thursday, 14 May 2015

फांसी कोई इलाज नहीं


फांसी कोई इलाज नहीं हँसता हमपै यो लुटेरा 
मर्ज समझल्याँ एक बै तो दूर नहीं यो सबेरा 
ट्रेक्टर की बाही मारै  ट्यूबवैल का रेट  सतावै
थ्रेशर की कढ़ाई मारै  भा फसल का ना थ्यावै
फल सब्जी ढूध  सीत सब ढोलां मैं घल ज्यावै
माटी गेल्याँ माटी होकै बी सुख का साँस ना आवै
बैंक मैं सारी धरती जाली दीख्या चारों कूट अँधेरा
 
निहाले पै रमलू तीन रूपया सैकड़े पै ल्यावै
वो साँझ नै रमलू धोरे दारू पीवन नै आवै
निहाला कर्ज की दाब मैं बदफेली करना चाहवै
विरोध करया तो रोज पीस्याँ की दाब लगावै
बैंक अल्यां की जीप का बी रोजाना लग्या फेरा
बेटा बिन ब्याह हाँडै सै घर मैं बैठी बेटी कंवारी
रमली रमलू नयों बतलाये मुशीबत कट्ठी  होगी सारी 
खाद बीज नकली मिलते होगी ख़त्म सब्सिडी  म्हारी
माँ टी बी की बीमार होगी बाबू कै दमे  की बीमारी
रौशनी कितै दीखती कोन्या घर मैं टोटे का डेरा
 
माँ अर बाबू म्हारे  नै  यो जहर धुर की नींद सवाग्या
माहरे घर का जो हाल हुआ वो सबके साहमी आग्या  
जहर क्यूं खाया उनने यो सवाल कचौट कै खाग्या   
म्हारी कष्ट कमाई उप्पर कोए दूजा दा क्यों लाग्या
कर्जा बढ़ता गया म्हारा मरग्या रणबीर सिंह कमेरा  
 

Monday, 27 April 2015

राम क्यूँ आंधा होग्या

चारों तरफ तैं मैं  घेरया , सांस मुश्किल तैं लेरया
 कति निचोड़ कै गेरया , राम क्यूँ आंधा होग्या ॥
भावां पर निगाह टिकी , बधावन की आस किमै
बेरा  ना कितना बढ़ेँगे , आवैगी मनै सांस किमै
दीखै फंदा यो फांसी का , बखत नहीं सै हांसी का
दौरा पड़ै सै खांसी का , राम क्यूँ आंधा होग्या॥
पूरा हांगा ला हमनै दिन रात खेत क्यार कमाया रै
मंडी मैं जइब लागी बोली बहोत घणा घबराया रै
ना मेरी समझ मैं आया , नहीं किसे नै समझाया
पग पग पै धोखा खाया , राम क्यूँ आंधा होग्या॥
धरती बैंक आल्यां कै लाल श्याही मैं चढ़गी लोगो
बीस लाख मैं एक किल्ला कुड़की कीमत बढ़गी लोगो
बीस लाख मैं के करूंगा , किस डगर पै पैर धरूंगा
दो चार सल्ल मैं डूब मरूंगा , राम क्यूँ आंधा होग्या॥
मेरे बरगे भाई सल्फास की गोली खा खा मरते देखो
जी मेरा  बी करता खाल्यूं , आज गधे खेती चरते देखो
नहीं देखूं मैं कुआँ झेरा ,यो  रणबीर सिंह साथी मेरा
सघर्ष चलवांगे चौफेरा , राम क्यूँ आंधा होग्या॥ 

दिल्ली आल्यो

दिल्ली आल्यो
गिणकै दिये सैं बोल तीन सौ साठ दिल्ली आल्यो
यो दुखी किसान देखै थारी बाट दिल्ली आल्यो
ज्यान मरण मैं आरी क्यों तम गोलते कोन्या 
या फसल हुई बर्बाद क्यों तम तोलते कोन्या 
कति बोलते कोन्या बनरे लाट दिल्ली आल्यो
इसी नीति अपनाई किसान यो बर्बाद करया
घर उजाड़ कै म्हारा अडाणी का आबाद करया
घना यो फसाद करया तोल्या घाट दिल्ली आल्यो
म्हारे बालक सरहद पै अपनी ज्यान खपावैं
थारे घूमैं जहाझयां मैं म्हारे खेत मैं धक्के खावैं
भूख मैं टीम बितावैं थारे सैं ठाठ दिल्ली आल्यो
धरती म्हारी खोसण की क्यों राह खोल दई
गिहूं धान क्यों म्हारी बिकवा बिन मोल दई
मचा रोल दई गया बेरा पाट दिल्ली आल्यो
रणबीर
27.4.2015

बदेशी का बीज पर कब्जा

बदेशी का बीज पर कब्जा 
अपणा बीज क्यूकर बनावां सोचो मिलकै सारे रै।।
कारपोरेट नै करया कब्जा धरती पै दे कै मारे रै ।।
देशी बीज पुराणे म्हारे हटकै ढूंढ कै ल्याणे होवैंगे
कसम खावां मोनसेंटो के बीज कदे नहीं बोवैंगे 
सब्जी मैं कारपोरेट छाया इब दूजे बीजां पै छारे रै।।
हर साल नया बीज ल्यो इसा कम्पनी का प्रचार रै
बीज की कीमत बढ़ाकै लूटैं किसान घना लाचार रै
कीटनाशक अनतोले बरते चोए के पाणी खारे रै।।
खेती म्हारी जहर बनादी लागत इसकी बढ़ती जा
बदेशी कम्पनी रोजाना या म्हारे सिर पै चढ़ती जा
खेती बाड़ी खून चूसरी आज कर्जे नै पैर पसारे रै।।
भाइयो गाम म्हारा रै यो बीज भी हो म्हारे गाम का
बदेशी की लूट घटैगी यो मान बढ़ैगा सारे गाम का
रणबीर बीज अपणा हो बचै फेर नफे करतारे रै।।
27.4.2015

हरी के हरियाणे मैं

हरी के हरियाणे मैं
श्यामत म्हारी आई , कोन्या दीखै राही , चढ़ी सै करड़ाई
हरी के हरियाणे मैं ॥
बोहर और भालौठ बताये , रूड़की किलोई संग दिखाए
कर्जा चढ्ज्या भारी , आया बैंक सरकारी , डूंडी पीटगी म्हारी
हरी के हरियाणे मैं ॥
धरती चढ़गी लाल स्याही मैं , फसल आयी म्हारी तबाही मैं
आज घंटी खुड़की , किलोई चाहे रूड़की , होवैगी म्हारी कुड़की
हरी के हरियाणे मैं ॥
आमदन या घाट लिकड़ती , लागत तो  बांधू लानी पड़ती
सब्सिडी खत्म म्हारी , देई घरां मैं बुहारी , श्यामत आगी म्हारी
हरी के हरियाणे मैं ॥
महंगी होन्ती जा सै  पढ़ाई रै , रणबीर मरै  बिना दवाई रै
दुःख होग्या  भारया , मन बी होग्या खारया , नहीं रास्ता पारया
हरी के हरियाणे मैं ॥   

हरियाणा के समाज मैं

हरियाणा के समाज मैं 
किसानां की मर आगी हरियाणा के समाज मैं ॥ 
धरती जरूरी जागी हरियाणा के समाज मैं ॥ 
रैहवण नै मकान कड़ै खावण नै नाज नहीं 
पीवण नै पाणी कड़ै  बीमारी का इलाज नहीं 
महँगाई जमा खागी हरियाणा के समाज मैं ॥ 
कपास पीटी धान पीट दिया गेहूं की बारी सै 
सल्फास की गोली खा मरां हुई या लाचारी सै 
या किसानी दुःख पागी हरियाणा के समाज मैं ॥ 
बदेशी कंपनी कब्ज़ा करगी ये हिन्दुस्तान मैं 
लाल कालीन बिछाए किसनै इनकी शान मैं 
इतनी घनी क्यों भागी हरियाणा के समाज मैं ॥ 
खेती म्हारी बर्बाद होगी उनकी आँख मींचगी 
नाड़  म्हारी पाई तलवार उनकी क्यों खींचगी 
रणबीर की छंद छागी हरियाणा के समाज मैं ॥ 

Saturday, 18 April 2015

KISE

किसे और की कहाणी कोन्या इसमैं राजा रानी कोन्या
सै अपनी बात बिराणी कोन्या, थोड़ा दिल नै थाम लियो।।

यारी घोड़े घास की भाई, नहीं चलै दुनिया कहती आई
मैं बाऊं और बोऊं खेत मैं, बाळक रुळते मेरे रेत मैं
भरतो मरती मेरी सेत मैं, अन्नदाता का मत नाम लियो।।

जमकै लूटै सै मण्डी हमनै, बीज खाद मिलै मंहगा सबनै
मेहनत लुटै मजदूर किसान की, आंख फूटी क्यों भगवान की
भरै तिजूरी क्यों शैतान की, देख सभी का काम लियो।।

चाळीस साल की आजादी मैं, कसर रही ना बरबादी मैं
बाळक म्हारे सैं बिना पढाई, मरैं बचपन मैं बिना दवाई
कड़ै गई म्हारी कष्ट कमाई, झूठी हो तै लगाम दियो।।

शेर बकरी का मेळ नहीं, घणी चालै धक्का पेल नहीं
टापा मारें पार पडैग़ी धीरे, मेहनतकश रुपी जितने हीरे
बजावैं जब मिलकै ढोल मंजीरे, रणबीर का सलाम लियो।।

Friday, 17 April 2015

पोह का म्हिना

पोह का म्हिना रात अन्धेरी, पड़ै जोर का पाळा 
सारी दुनिया सुख तैं सोवै मेरी ज्यान का गाळा 

सारे दिन खेतां के म्हां मनै ईख की करी छुलाई 
बांध मंडासा सिर पै पूळी, हांगा लाकै ठाई 
पूळी भारया जाथर थोड़ा चणक नाड़ मैं आई 
आगे नै डिंग पाट्टी कोन्या, थ्योड़ अन्धेरी छाई 
झटका देकै चणक तोड़ दी हुया दरद का चाळा 

साझे का तै कोल्हू था मिरी जोट रात नै थ्याई 
रुंग बुळथ के खड़े हुए तो दया मनै भी आई 
इसा कसाई जाड्डा था भाई मेरी बी नांस सुसाई 
मजबूरी थी मिरे पेट की, कोन्या पार बसाई 
पकावे तैं न्यों कहण लग्या कदे होज्या गुड़ का राळा 

कई खरच कठ्ठे होरे सैं, ज्यान मरण मैं आई 
गुड़ नै बेचो गुड़ नै बेचो, इसी लोलता लाई 
छोरी के दूसर की सिर पै, आण चढ़ी करड़ाई 
सरकारी करजे आळयां नै, पाछै जीप लगाई 
मण्डी के म्हां फंसग्या क्यूकर होवै जीप का टाळा 

खांसी की परवाह ना करी, पर ताप नै आण दबोच लिया 
डाक्टर नै एक सूआ लाया, दस रुपये का नोट लिया 
मेरे पै गरदिश क्यों चढ़गी, मनै इसा के खोट किया 
कई मुसीबत कठ्ठी होगी, सारियां नै गळजोट लिया 
रणबीर साझे जतन बिना भाई टळै ना दुख का छाळा

Monday, 9 March 2015

Shaheed Bhagat Singh

भगत सिंह देश के हालातों का विश्लेषण करते हुए एक रोज अपने साथियों को बताता है ~~~~~
बुरी माड़ी कार करांगे तै या कैसे गुलामी जावैगी रै।।
बिना म्हारी थारी एकता के या कौम हरामी खावैगी रै।।
म्हारी कोए इज्जत कोन्या गोरे बिना बात दाब देवैं रै
म्हारे मूंह मैं टूक टांट पै जूता गोरे साहब देवैं रै
डैम ब्लेडीफूल की गाली बहोत ए खराब देवैं रै
किसान लागते घणे भूण्डे कदे ना कोए लाभ देवैं रै
फूट गेरो राज करो की नीति आम्हा साहमी लड़वावैगी रै।।
हम खोलां कान बहरे इन अफसर होद्देदारां के
हमनै मानस ना समझैं बैठानिया टमटम कारां के
सच्चाई पूरी समझनी होगी झूठी बातां का साहरा के 
हमतो मरैं गरीबी मैं गौरे पहरैं सूट हजारां के 
गोरयां का राज रहया तो म्हारी कछी पजामी जावैगी रै।।
कहै मैं सेठां मैं सेठ बड़ा चुण्या गया दुनिया मैं देखो
दूर दूर के मुलकां मैं स्याणा गिण्या गया दुनिया मैं देखो 
दिमाग लगाकै जाल पूरा बुण्या गया दुनिया मैं देखो 
म्हारा करया विरोध जिसनै धुण्या गया दुनिया मैं देखो 
नहीं बेरा था गोऱयां नै कुकर्मां तैँ बदनामी आवैगी रै।।
आजादी का जनून जो म्हारा यो गुलामी का दाग धोवैगा
उठ ऊपर जात पात तैं बीज राष्ट्र प्रेम के बोवैगा 
जनता के संघर्ष के आगै गोरा कसूती ढालाँ रोवैगा
अंग्रेजो भारत छोड़ो का नारा सफल जरूरी होवैगा
रणबीर भगतसिंह तैं रोज दई सलामी जावैगी रै।।