Friday, 17 April 2015

पोह का म्हिना

पोह का म्हिना रात अन्धेरी, पड़ै जोर का पाळा 
सारी दुनिया सुख तैं सोवै मेरी ज्यान का गाळा 

सारे दिन खेतां के म्हां मनै ईख की करी छुलाई 
बांध मंडासा सिर पै पूळी, हांगा लाकै ठाई 
पूळी भारया जाथर थोड़ा चणक नाड़ मैं आई 
आगे नै डिंग पाट्टी कोन्या, थ्योड़ अन्धेरी छाई 
झटका देकै चणक तोड़ दी हुया दरद का चाळा 

साझे का तै कोल्हू था मिरी जोट रात नै थ्याई 
रुंग बुळथ के खड़े हुए तो दया मनै भी आई 
इसा कसाई जाड्डा था भाई मेरी बी नांस सुसाई 
मजबूरी थी मिरे पेट की, कोन्या पार बसाई 
पकावे तैं न्यों कहण लग्या कदे होज्या गुड़ का राळा 

कई खरच कठ्ठे होरे सैं, ज्यान मरण मैं आई 
गुड़ नै बेचो गुड़ नै बेचो, इसी लोलता लाई 
छोरी के दूसर की सिर पै, आण चढ़ी करड़ाई 
सरकारी करजे आळयां नै, पाछै जीप लगाई 
मण्डी के म्हां फंसग्या क्यूकर होवै जीप का टाळा 

खांसी की परवाह ना करी, पर ताप नै आण दबोच लिया 
डाक्टर नै एक सूआ लाया, दस रुपये का नोट लिया 
मेरे पै गरदिश क्यों चढ़गी, मनै इसा के खोट किया 
कई मुसीबत कठ्ठी होगी, सारियां नै गळजोट लिया 
रणबीर साझे जतन बिना भाई टळै ना दुख का छाळा

Monday, 9 March 2015

Shaheed Bhagat Singh

भगत सिंह देश के हालातों का विश्लेषण करते हुए एक रोज अपने साथियों को बताता है ~~~~~
बुरी माड़ी कार करांगे तै या कैसे गुलामी जावैगी रै।।
बिना म्हारी थारी एकता के या कौम हरामी खावैगी रै।।
म्हारी कोए इज्जत कोन्या गोरे बिना बात दाब देवैं रै
म्हारे मूंह मैं टूक टांट पै जूता गोरे साहब देवैं रै
डैम ब्लेडीफूल की गाली बहोत ए खराब देवैं रै
किसान लागते घणे भूण्डे कदे ना कोए लाभ देवैं रै
फूट गेरो राज करो की नीति आम्हा साहमी लड़वावैगी रै।।
हम खोलां कान बहरे इन अफसर होद्देदारां के
हमनै मानस ना समझैं बैठानिया टमटम कारां के
सच्चाई पूरी समझनी होगी झूठी बातां का साहरा के 
हमतो मरैं गरीबी मैं गौरे पहरैं सूट हजारां के 
गोरयां का राज रहया तो म्हारी कछी पजामी जावैगी रै।।
कहै मैं सेठां मैं सेठ बड़ा चुण्या गया दुनिया मैं देखो
दूर दूर के मुलकां मैं स्याणा गिण्या गया दुनिया मैं देखो 
दिमाग लगाकै जाल पूरा बुण्या गया दुनिया मैं देखो 
म्हारा करया विरोध जिसनै धुण्या गया दुनिया मैं देखो 
नहीं बेरा था गोऱयां नै कुकर्मां तैँ बदनामी आवैगी रै।।
आजादी का जनून जो म्हारा यो गुलामी का दाग धोवैगा
उठ ऊपर जात पात तैं बीज राष्ट्र प्रेम के बोवैगा 
जनता के संघर्ष के आगै गोरा कसूती ढालाँ रोवैगा
अंग्रेजो भारत छोड़ो का नारा सफल जरूरी होवैगा
रणबीर भगतसिंह तैं रोज दई सलामी जावैगी रै।।

Wednesday, 31 December 2014

रेगुलर नौकरी

रेगुलर नौकरी 

रेगुलर नौकरी पाना कोन्या कति आसान बताऊँ मैं ||
सी ऍम ऍम  पी सब धोरै पाँच साल तैं धक्के खाऊँ मैं ||  
पहलम कहवैं थे टेस्ट पास करे पाछै तूं बताईये 
पास करे पाछै बोले पहले चालीस गये बुलाईये 
एक विजिट चार सिफरिसी दो  हजार तले आऊँ मैं ||
सरकारी नौकरी रोज तड़कै ढूंढूं सूँ अख़बार मैं 
दुखी इतना हो लिया सूँ यकिन रहया ना सरकार मैं 
एजेंट हाँडें बोली लानते कहैं चाल  नौकरी दिवाऊं मैं  ||
एम् सी ए कर राखी कहैं डेटा आपरेटर लवा देवां 
कदे कहैं नायब तसीलदार ल्या तनै बना देवां 
तिरूँ डूबूं मेरा जी होरया सै पी दारू रात बिताऊँ मैं ||
घर आली पी एच डी करै उसकी फिकर न्यारी मने 
दोनूं बेरोजगार रहे तो के बनेगी या चिंता खारी मने  
रणबीर बरोने आले तनै सुनले दुखड़ा सुनाऊँ मैं ||

Sunday, 28 December 2014

बिल्ली कै घंटी कौण बांधै

बिल्ली  कै घंटी  कौण  बांधै
भेड़ों की  ढालां  बेघर लोगों का शहरां के ख़राब तैं  ख़राब घरां  में बढ़ता जमावड़ा आज के हरयाणा  की एक  कड़वी सच्चाई  सै ।
सारे  सामाजिक नैतिक बन्धनों का तनाव ग्रस्त होना तथा टूटते जाना  गहरे संकट की घंटी बजावण  सैं ।  बेर ना 
हमनै  सुनै   बी सै अक नहीं ? माहरे परिवार के  पितृ स्तात्मक  ढांचे में अधीनता (परतंत्रता ) का तीखा होना साफ  साफ  
देख्या जा  सकै  सै  । जिंघान  देखै  उँघानै पारिवारिक रिश्ते नाते ढहते जाना ।   युवाओं के  साहमी  पढ़ाई  लिखाई अर  रोजगार 
 की गंभीर चुनौतीयाँ  सैं ।   परिवारों में बुजुर्गों की असुरक्षा का बढ़ते जाना  जगहां  जगहाँ  देखन  मैं आवै सै ।  दारू नै रही सही 
कसर पूरी करदी , घर तो गामां  मैं  कोई बच नहीं रह्या  दारू तैं , मानस एकाध घर मैं बचरया  हो तो  न्यारी बात सै । ताश खेलण
तैं  फुरसत  नहीं ।  काम कै  हाथ लाकै  कोए  राज्जी  नहीं । बैलगाड्डी  की जागां  बुग्गी  नै   ले  ली  अर  बुग्गी  चलना  भी महिला 
के सिर  पै  आण  पड़या ।  ऐह्दी पणे  की हद होगी । महिलावाँ  पै और  बालकां  पै काम का बोझ बढ़ता जाण  लागरया  सै  | 
असंगठित क्षेत्र  बधग्या  अर  जन सुविधावां  मैं  घनी  कमी  आंती  जावै  सै |  एक नव धनाढ्य  वर्ग  पैदा होग्या  हरित क्रांति 
पाच्छै  उसकी  चांदी  होरी  सै  ।  उसका  निशाना  सै  पीस्से   कमाना  कुछ  भी  करकै   \ कठिन जीवन होता जा   सै । मजदूर वर्ग 
को पूर्ण रूपेण ठेकेदारी प्रथा में धकेल्या जाना आम बात की  ढा लां  देख्या  जा  सै  ।गरीब लोगों के जीने के आधार  कसूते  ढा ल  
सिकुड़ता  जान  लाग रया  सै \गाँव  तैं शहर को पलायन   का बढ़ना तथा लम्पन तत्वों की बढ़ोतरी होणा   चारों  कान्ही  दीखै  सै 
 | शहरां के विकास में अराजकता  छागी | ठेकेदारों  और प्रापर्टी डीलरों का बोलबाला  होग्या  चा रों तरफ ।
 जमीन की उत्पादकता में खडोत , पानी कि समस्या , सेम कि समस्या  तैं  किसानी का   संकट  गहरा ग्या ।  कीट नाशकां  के  
अंधाधुंध  इस्तेमाल  नै  पानी कसूता प्रदूषित कर दिया अर  कैंसर  जीसी  बीमारियां  के बधण  का   खतरा  पैदा  कर दिया । 
कृषि  तैं  फालतू  उद्योग कि तरफ  अर व्यापार की तरफ जयादा ध्यान  दिया  जावै  सै  इब  । 
स्थाई हालत से अस्थायी हालातों 
पर जिन्दा रहने का दौर आग्या  दीखै  सै ।   अंध विश्वासों को बढ़ावा दिया  जावण  लाग रया  सै  | हर दो किलोमीटर पर मंदिर 
का उपजाया जाना अर टी वी पर भरमार  सै  इसे  मैटर की ।
अन्याय  अर  असुरक्षा का बढ़ते जाण  की  साथ  साथ  कुछ लोगों के प्रिविलिज बढ़ रहे  सैं ।  मारूति से सैंट्रो कार की तरफ रूझान | आसान काला धन काफी इकठ्ठा किया गया सै । उत्पीडन अपनी सीमायें लांघता जा रया  सै  |गोहाना काण्ड  , मिर्चपुर कांड अर  रूचिका कांड ज्वलंत उदाहरण  सैं |
* व्यापार धोखा धडी में बदल  लिया  दीखै  सै । शोषण उत्पीडन और भ्रष्टाचार की तिग्गी भयंकर रूप धार रही  सै । भ्रष्ट नेता , 
भ्रष्ट अफसर और भ्रष्ट पुलिस   का  गठजोड़ पुख्ता हो  लिया  सै । प्रतिस्पर्धा ने दुश्मनी का रूप धार लिया ।  तलवार कि जगह 
सोने ने ले ली । वेश्यावृति दिनोंदिन बढ़ती जा सै  ।  भ्रम  अर  अराजकता का माहौल बढ़रया  सै  | धिगामस्ती बढ़ री  सै ।  
               संस्थानों की स्वायतता पर हमले बढे  पाछले  कुछ सालों  मैं । लोग मुनाफा कमा कर रातों रात करोड़ पति से अरब पति
 बनने के सपने देख रहे सैं  अर  किसी भी हद तक अपने  आप  नै गिराने को तैयार  सैं  । खेती में मशीनीकरण तथा औद्योगिकीकरण मुठ्ठी भर लोगों को मालामाल कर गया तथा लोक  जण को गुलामी व दरिद्रता में धकेलता जारया  सै । बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का शिकंजा कसता जावण  लाग रया  सै 
वैश्वीकरण को जरूरी बताया जारया  सै जो असमानता पूर्ण विश्व व्यवस्था को मजबूत करता जाण  लाग  रहया  सै । पब्लिक सेक्टर
 की मुनाफा कमाने वाली कम्पनीयों को भी बेच्या जा रया   सै ।  हमारी आत्म निर्भरता खत्म करने की भरसक नापाक साजिश 
की जा रही सै । साम्प्रदायिक ताकतें देश के अमन चैन के माहौल को धाराशाई करती जा रही  सैं  जिनतें  हरयाणा  भी  अछूता  
 कोणी   सकता ।  सभी संस्थाओं का जनतांत्रिक माहौल खत्म किया जा रया  है । बाहुबल, पैसे , जान पहचान , मुन्नाभाई , ऊपर
 कि पहुँच वालों के लिए ही नौकरी के थोड़े बहुत अवसर बचे  सैं ।  महिलाओं  में अपनी मांगों के हक़ में खडा  होने  का उभार 
दिखाई देवै  सै | सबसे ज्यादा वलनेरेबल भी समाज का यही हिस्सा दिखाई देसै  मग़र सबसे ज्यादा जनतांत्रिक मुद्दों पर , नागरिक 
समाज के मुद्दों पर , सभ्य समाज के मुद्दों पर संघर्ष करने कि सम्भावना भी यहीं ज्यादा दिखाई देसै ।  वर्तमान विकास प्रक्रिया
भारी सामाजिक व इंसानी कीमत मानगणे  आली   सै  | इसको संघर्ष के जरिये पल ट्या जाना बहुत जरूरी  सै । फेर  बिल्ली  कै 
घंटी  कौण  बांधै ?

गया चौदा आवैगा पन्दरा

गया चौदा  आवैगा पन्दरा 
उठा पटक घनी देखि दो हजार चौदा  के साल मैं । 
दो हजार पन्दरा  मैं देश जान्ता दिखै बुरे हाल मैं । 
कालेधन का बोलबाला पाछले साल बताया देखो 
घोटाले पर घोटाला यो   सबके साहमी आया देखो 
कांग्रेस को सबक सिखाया देखो गेरदी पातळ मैं । 
जिन बातां का साहरा लेकै भाजपा केंद्र मैं आगी 
मोदी जी की लफ्फाजी एकबै पूरी जनता मैं छागी 
मीडिआ भी रोल निभागी मोदी के छवि उछाल मैं । 
महंगाई तैं ध्यान हटावन नै आर एस एस भड़कावै 
क्लेश हिन्दू मुस्लिम का जागां जागां पै भढ़वावै 
नफरत का जहर फैलावै यू पी बिहार बंगाल मैं । 
मेक इन इंडिया का नारा या बोल दई सरकार नै 
नकेल बदेशी कम्पनियाँ की खोल दई सरकार नै 
जहर घोल दई सरकार नै किसानां के खलिहान मैं । 
रणबीर --28 . 12 . 2014 


Saturday, 13 December 2014

धोल कपड़िये

16  दिसंबर 2014 को निर्भया के साथ हुई जघन्य बलात्कार की घटना के दो वर्ष पूरे होने जा रहे हैं । इस प्रकार की हो रही तमाम जघन्य घटनाओं के विरोध में 12 संगठनों  के द्वारा मानसरोवर पार्क रोहतक में 2  बजे बाद दोपहर एक कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है ।  आप  सबसे अपील  है कि  ज्यादा से जयादा संख्या में शामिल  हों । 
"संगठनों के समूह की ओर  से "

धोल कपड़िये
मित्र बण कै वार करैं आज के धोल कपड़िये रै।
बेटा इन आली राही तूं मतना कदे पकड़िये रै।
बिना हेरा फेरी चोरी जारी ये जमा नहीं जी पावैं रै
मिलावट कर सब क्याहें मैं मुनाफा खूब कमावैं रै
बिना बात की बातां पै ये बणज्यां सैं अकड़िये रै।
बिन मेहनत कमा मुनाफा पीस्से नै पीस्सा खींचै रै
काले धन पर ऐष करैं सच्चाई तैं आंख मींचै रै
अरदास म्हारी सै इनके धोरे कै ना लिकड़िये रै।
काला धन कई तरियां के घर मैं ऐब ल्यावै फेर
दारू की लत पड़ज्या पराई बीर पै लखावै फेर
यो काला धन माणस नै घणा कसूता जकड़िये रै।
काली नैतिकता आज या धोली पै छाती आवै सै
सच्चाई कै गोला लाठी देकै रोजाना धमकावै सै
रणबीर काले की दाब मैं जमा नहीं सिकुड़िये रै।

नया साल चुनौतियों भरा है मंजूर सबको

कलकता हवाई अड्डे पर पता लगा की दामिनी ने अपने संघर्ष की आखिरी सांस सिंघापुर में ली है तो बहुत दुख हुआ और यह रागनी वहीं पर लिखी-
याद रहैगा थारा बलिदान दामिनी भारत देष जागैगा।
थारी कुरबानी रंग ल्यावैगी समाज पूरा हिसाब मांगैगा।
सिंघापुर मैं ले जा करकै बीह म थामनै बचा नहीं पाये
थारी इस कुर्बानी नै दामिनी आज ये सवाल घने ठाये
गैंग रेप की कालस का यो अंधेरा भारत देष तैं भागैगा।
दामिनी पूरा देश थारी साथ यो पूरी तरियां खड्या हुया
जलूस विरोध प्रदर्शन कर समाज सारा अड़या हुया
फांसी तोड़े जावैंगे वे जालिम इसपै हांगा पूरा लागैगा।
महिला संघर्ष की थाम दामिनी आज एक प्रतीक उभरगी
दुनिया मैं थारी कुर्बानी की कोने-कोने सन्देश दिगर गी
इसमें शक नहीं बचर या कोर्ट जालिमों नै फांसी टांगैगा।
लम्बा संघर्ष बदलन का सोच समझ आगै बढ़ ज्यांगे
मंजिल दूर साई दामिनी हम राही सही पै चढ़ ज्यांगे
कहै रणबीर सिंह नए साल मैं जालिम जरूरी राम्भैगा।
वास्तव में पूरे देश में एक बार निर्भया के हक में और ब्लात्कारियों के विरोध में एक जन सैलाब सड़कों पर उमड़ आया था। जस्टिस वर्मा की रिपोर्ट में कई सिफारिसें की गई थी ।

Wednesday, 10 December 2014

गरज गरज के प्यारे

दादा पंडित लखमी चन्द की एक रागनी
गरज गरज के प्यारे
देखे मर्द नकारे हों सैं गरज गरज के प्यारे हों सैं
भीड़ पड़ी मैं न्यारे हों सैं तज कै दीन ईमान नै।।
जानकी छेड़ी दशकन्धर नै,गौतम कै गया के सोची इन्द्र नै
रामचन्द्र नै सीता ताहदी,गौरां षिवजी नै जड़ तैं ठादी
हरिश्चन्द्र  नै भी डायण बतादी के सोची अज्ञान नै।।
मर्द किस किस की ओड घालदे, डबो दरिया केसी झाल दे
निहालदे मेनपाल नै छोड़ी , जलग्यी घाल धर्म पै गोड़ी
अनसूइया का पति था कोढ़ी,वा डाट बैठगी ध्याान नै।।
मर्द झूठी पटकैं सैं रीस, मिले जैसे कुब्जा से जगदीश
महतो नै शीष बुराई धरदी,गौतम नै होकै बेदर्दी
बिना खोट पात्थर की करदी खोकै बैठगी प्राण नै।।
कहैं सैं जल शुद्ध पात्र मैं घलता लखमीचन्द कवियों मैं रलता
मिलता जो कुछ करया हुया सै, छन्द कांटे पै धरया हुया सै
लय दारी मैं भरया हुया सै, देखो तसे मिजान नै।।

साच्ची बात


बाजे भगत जी की एक रागनी सम सामयिक मुद्ये को छूती हुई
साच्ची बात कहण मैं सखी हुया करै तकरार।।
दगाबाज बेरहम बहन ना मरदां का इतबार।।
रंगी थी सती प्रेम के रंग मैं, साथ री बिपत रुप के जंग मैं
दमयन्ती के संग मैं किसा नल नै करया ब्यौहार
आधी रात छोड़ग्या बण मैं लिहाज षरम दी तार।।
सखी सुण कै क्रेाध जागता तन मैं  मरद जले करैं अन्धेरा दिन मैं
चौदहा साल दुख भोगे बण मैं,ना तज्या पिया का प्यार
फेर भी राम नै काढ़ी घर तैं, वा सीता सतवन्ती नार।।
बात हमनै मरदां की पागी,घमन्ड गरुर करै मद भागी
बिना खोट अन्जना त्यागी, करया पवन नै अत्याचार
काग उडाणी बणा दई, हुया इसा पवन पै भूत सवार।।
खोट सारा मरदां मैं पाया, षकुन्तला संग जुल्म कमाया
गन्धर्व ब्याह करवाया दुश्यन्त नै, कर लिए कौल करार
शकुन्तला ना घर मैं राखी , बण्या कौमी गद्दार।।

Sunday, 30 November 2014

कुदरती खेती और सेहत

कुदरती खेती और सेहत का सीधा रिश्ता बताया रै ॥
हरित क्रांति तै पैदावार बढी बीमारी को भी बढ़ाया रै ॥
हाँगा लाकै करी रै खेती अन्न मैं आत्मनिर्भर बनाया
धणी किसान फायदा ठागे गरीब  तो खड़या लखाया
दो किल्ले आला लुटग्या कुछ किसानां कै चांदना छाया
गेहूँ की पैदावार मैं हमनै पूरे देश मैं नाम कमाया
नफे नै शहर मैं बनाई कोठी मोल्लू खड्या लखाया रै ॥
कुदरती खेती ------------------------------------------॥
हरित क्रांति नै या पैदावार  किसानां की खूबै बढ़ाई
पर धरती पोल्ली करी  फर्टी लिटी पढ़न बिठाई
कितै तै चौआ बधग्या कितै पाणी नै जमा तली दिखाई
कीट नाशक खूब छिड़के होया पानी प्रदूषित भाई
कीटनाशक घुल्या पाणी खाने मैं घणा कहर ढाया रै ॥
कुदरती खेती ------------------------------------------॥
सरकारी अस्पतालां मैं भीड़ बीमारां की बढ़ती जावै
प्राइवेटों कै भीड़ कसूती जनता घणी लुटती जावै
रोक थाम का जिकरा कोण्या इलाज म्हारी घटती जावै
हैल्थ  क्षेत्र पर खर्च सरकारी  दिन ब  दिन कटती जावै
कुदरती खेती करां जै चाहते बीमारी को भगाया  रै ॥
कुदरती खेती ------------------------------------------॥
कई बीमारी के  कीट नाशक ये कारण आज बताये
आज खाज बीमारी बढ़गी डाक्टरों नै बी हाथ ठाये
कैंसर बढ़गे पंजाब मैं  हरयाणा मैं भी बढ़े दिखाये
पेट बीमारी  मैं भी कई कीट नाशक बन बैरी आये
रणबीर बरोने आले नै  सोच कै नै छन्द बनाया रै ॥
कुदरती खेती ------------------------------------------॥


रोहतक   वासियों से अपील 
अलग अलग संगठनों  के साथियों से  बातचीत के बाद यह तय  किया गया है कि ज्ञान  विज्ञानं आंदोलन , सप्तरंग , हरयाणा इन्साफ सोसाइटी ,  संगठनों के साथी , नागरिक मंच के साथी तथा दुसरे सभी सगंठनों के साथी व रोहतक के गण मान्य नागरिकों से अपील है की आसन गॉवों की लड़कियों के साथ हुई छेड़ छाड़ और मार पिटाई के मामले में आगे की कार्यवाही पर चर्चा करके एक्शन लेने के लिए कल 1 दिसम्बर को  सुबह 10 बजे सभी साथी मानसरोवर पार्क में पहुंचने का कष्ट करें ताकि बहादुर लड़कियों को होंसला मिल सके और पूरा न्याय दिलवा सकें । 
रणबीर सिंह दहिया 
हरयाणा ज्ञान विज्ञानं समिति 



Saturday, 18 October 2014

जनता बी खूब बिगाड़ दई

जनता बी खूब बिगाड़ दई

नेता की नीयत माड़ी जनता बी खूब बिगाड़ दई
पीकै  दारू लेकै पीस्से जीवन की राह लिकाड लई
जनता का बी बेरा  ना दन साच्चेी बात नै समझै रै
बेर सै कौण नाश करणिया पांच दो सात नै समझे रै
विकल्प की बात ना सोचै झूठ गेल्याँ कज जुगाड़ लई।
जिस डाहले पै बैठी जनता उसे नै काट रही सै
 लाल झण्डा  सही हिम्माती वोट तैं नाट रही सै
लूट कई बी ना समझै बंद कर दिमागी किवाड़ लई ।
साहूकारां की चाल लुभाले  लाल झण्डा भूल जावै या
छियासठ साल हो लिए सैं पूंजी चौपड़ सार बिछावै या
भ्र्ष्टाचारी व्यवस्था नै जनता तै ठवा कबाड़ दई ।
लाल झंडे आले बी इसकी श्यान समझा ना पाये रै
यूनियन मैं इंकलाब जिंदाबाद ये नारे गुंजाये रै
रणबीर सिंह दुखी घणा सै कलम  आज चिंघाड़ दई ।

Friday, 17 October 2014

मरीज  का इंसानी पक्ष 


इंसान  मरीज  हो  गया  
मरीज  का  भी  हर्निया  
बस  दिखाई  देता  है  
सर्जन   को  क्या  हुआ  
मायोपिक नजर हो गयी  
इंसानियत और इंसान की  
परिभाषा  ही  खो गयी 

तीन मुँही नागण काली


तीन मुँही नागण काली म्हारे भारत देश  नै डसगी ॥
शरीर हुया काला इंका जनता आज कसूती फंसगी ॥
मुद्रा कोष का फण जहरी इंका काट्या मांगै पाणी ना
दूसरा फण विश्व बैंक का तासीर इसकी पिछाणी ना
डब्ल्यू टी ओ तीजा फण सै बचै इंका डस्या प्राणी ना
नागण के सप्लोटिये कहैं नागण माणस खाणी ना
इसके जहर की छाया समाज की नस नस मैं बसगी ॥
तीन मुँही नागण काली म्हारे भारत देश  नै डसगी ॥
ढांचागत समायोजन सैप नै कसूते गुल खिला दिए
शिक्षा पाई खर्चा कम करो फरमान इसे सुणा दिए
सेहत तैं ना कोए लेना देना मंतर गजब पढ़ा दिए
पब्लिक सैक्टर औने पौने मैं ये इसनै बिका दिए
संकट मोचक बणकै आया संकट की कोळी क्सगी ॥
तीन मुँही नागण काली म्हारे भारत देश  नै डसगी ॥
गरीब देशां का हितेषी वैश्वीकरण बणकै आया रै
तीन मुँही नाग के दम पै हर देश लूट कै खाया रै
अपनी मौज मस्ती की ताहिं नया गुल खिलाया रै
चका चौंध इसी मचा दी अपना दीखै सै पराया रै
ये गरीब तबाह होते आवैं गाळ भीतर नै धंसगी ॥
तीन मुँही नागण काली म्हारे भारत देश  नै डसगी ॥
बाळकां की दुर्गति करदी जवानी आज की बोड़ी होगी
म्हारे डांगर मरण लागरे ठाड्डी रेश  की घोड़ी होगी
अमीर गरीब के बीच की खाई आज और भी चौड़ी होगी
बदेशी तीन मुँही नागण की देशी नागण तैं  जोड़ी होगी
 रणबीर सिंह की कविताई तैं ज्योत अँधेरे मैं चसगी ॥
तीन मुँही नागण काली म्हारे भारत देश  नै डसगी ॥
2001 

Saturday, 11 October 2014

लोकगीतों का बुगचा बालम की जकड़ी

लोकगीतों का बुगचा
बालम की जकड़ी
बेबे  मैं  बालम की प्यारी हे घर म्है सासू का नखरा
मैं तो चून  पीस के  ल्याई उनै मोटा  हे बताया
उनै मोटा  हे बताया मनै चुटकी से उड़ाया
बेबे  मैं  बालम की प्यारी हे घर म्है सासू का नखरा
उनै मोटा हे बताया उनै   बेटा  हे सिखाया
उनै बेटा  हे सिखाया ओ तो  फूलसन्टी ल्याया
 तो  फूलसन्टी ल्याया मेरी सुड़म सूड़  मचाई
बेबे  मैं  बालम की प्यारी हे घर म्है सासू का नखरा
मेरी सूड़म सूड़ मचाई मनै आसन पाटी खाई
मनै आसान  पाटी खाई उनै हलवा ऐ बनाया 
उनै हलवा हे  बणाया उनै ऊँगली से चटाया 
बेबे  मैं  बालम की प्यारी हे घर म्है सासू का नखरा
उनै अंगली से चटाया मनै अँगली काट खाई 
मनै अँगली काट खाई ओ डाक्टर नै ल्याया 
बेबे  मैं  बालम की प्यारी हे घर म्है सासू का नखरा
ओ तो डाक्टर नै ल्याया  मेरी हाँसी छुट  आई
हाँसी छुट आई ओ तो सेर  लाड्डू ल्याया 
 ओ तो सेर लाडडू ल्याया मनै गप गप  खाया 
बेबे  मैं  बालम की प्यारी हे घर म्है सासू का नखरा
संकलन कर्त्ता --निर्मल 



Wednesday, 24 September 2014

शहीद भगत सिंह

शहीद भगत सिंह 
थारा नाम सुण्या हमनै तों शहीद सबतैं निराला पाया 
तेईस बरस की  उम्र थामनै देश तैं राह असल दिखाया 

थारे बरगे नौजवान देश मैं आज ये टोहें तैं पान्ते 
बाकी अपने आप मैं मस्त देश कान्ही नहीं लखांते 
थारी कुर्बानी याद म्हारै देख देश घोटाळ्यां नै खाया ॥ 
तेईस बरस की  उम्र थामनै देश तैं राह असल दिखाया॥ 

गामां मैं घर कोये बच्या ना मानस बेशक बचरया हो 
गाल सूनी सूनी लागैं सैं जण काला नाग दसऱ्या हो 
थारी नैतिकता भूल गए नशे पते नै ऊधम मचाया ॥ 
तेईस बरस की  उम्र थामनै देश तैं राह असल दिखाया॥ 
3. 
शोषण रहित समाज का सपना चकना चूर करया 
समाज वाद का थारा रास्ता ना इधर कदम धरया 
नौज वान सभा नै हरयाणे मैं थारे रस्ते कदम बढ़ाया ॥ 
तेईस बरस की  उम्र थामनै देश तैं राह असल दिखाया॥ 
4. 
हालात मुश्किल देश के फासिज्म मुँह बारया आज 
देश तोड़क ताक़तां का यो असर बढ़ता जारया आज 
थारे रास्ते पर बढ़ते जावाँ रणबीर ज्याँ कलम उठाया ॥ 
तेईस बरस की  उम्र थामनै देश तैं राह असल दिखाया॥ 
रणबीर सिंह 
24 . 9. 2014 

गाम हरयाणे के

गाम हरयाणे के
ओले हाथ नै सोले का भरोसा   नहीं रहया बताया रै ॥
के होग्या म्हारे समाज कै यो अविस्वास सारै छाया रै ॥
1
महिला की इज्जत नै रोजाना यो कौन लूट रहया
गुण्डा लेकै रिवाल्वर पूरे गाम मैं खुल्ला छूट रहया
गाम पी खून का घूँट रहया दारू नै ऊधम मचाया रै ॥
ओले हाथ नै सोले का भरोसा   नहीं रहया बताया रै ॥
2
शहरां तैं घणे गाम आज असुरक्षित होंते आवैं सैं
वंचित तबके गामां मैं मुश्किल तैं रात बितावैं सैं
ठाड़े छोरी ठा लेज्यावैं रिवाल्वर का खौफ बिठाया रै ॥
 ओले हाथ नै सोले का भरोसा   नहीं रहया बताया रै ॥
3
जो बोलैं उणनै पीटैं उनपै झूठे इल्जाम लवादें सैं
स्कूल जाण तैं छोरी घबरावैं पढ़ना ये छटवादें सैं
काबू ना आवै उनै मरवादें सैं किसा जमाना आया रै ॥
ओले हाथ नै सोले का भरोसा   नहीं रहया बताया रै ॥
4
चुप्पी साधें पार पड़ै हमनै आवाज उठानी होगी
गुंडा गर्दी पै सबनै मिलकै लगाम लगनी होगी
हिम्मत कर रणबीर नै इनके खिलाफ कलम ठाया रै ॥
ओले हाथ नै सोले का भरोसा   नहीं रहया बताया रै ॥
रणबीर सिंह
24. 9. 2014 

Tuesday, 23 September 2014

समझ अपनी अपनी

समझ अपनी अपनी 
एक बूढी महिला नै इंडियन एयर लाइन्स के दफ्तर मैं फोन करया अर बूझ्या ,
" दिल्ली तैं कलकत्ता जावण  आला जहाज कितना टेम  लेवै सै ?"
"एक मिनट |" कहकै एयर लाइन्स का कर्म चारी अपनी समय तालिका देखण लाग्या |
दूसरी तरफ तै आवाज आई ," धन्यवाद " अर महिला नै फोन धर दिया |

Monday, 22 September 2014

doha

पांणी प्रदूषित / हवा प्रदूषित / खाणा प्रदूषित 
दिमाग प्रदूषित / फेर हर घर मैं बीमारी नहीं 
तो के मोर नाचैगा / कितने ए  डाक्टर लियाओ 
बात काबू कोणी  आवै /डाक्टर अर जनता रोज 
आपस मैं मारा मारी पै  आवै / कसूरवार इसका 
51 हजार की माला घलवावै 

सही सोच के संघर्ष बिना इब जनता पिटती जारी हे ॥

समाज व्यवस्था हुई हड़खाई  सबतैं बड्डी बीमारी हे ॥
इसका काट्या मांगै  पाणी  ना कोय नर और नारी हे॥
सीरकी घाल करैं गुजारा देखो जिणनै ताज महल बनाये
उनके बालक भूखे मरते जिणनै खुबै ये खेत कमाये
तन पै उनके लत्ता ना जिणनै कपड़े के मील चलाये
वे बिना दूध सीत रहवैं जिणनै ये डांगर ढोर चराये
भगवन भी अँधा कर दिया नहीं  दिखै भ्रष्टाचारी हे ॥
जितना करड़ा काम म्हारा उतना नहीं सम्मान मिलता
दस नंबरी मानस जितने उनका हुकम सारै पिलता
नकली फूल सजावैं सारे नहीं घर मैं असली खिलता
कहैं उसके बिना दुनिया मैं यो पत्ता तक नहीं हिलता
सबका ख्याल नहीं करता वो किसा सै न्या कारी ॥
डांगर की कदर फालतू मानस बेकदरा संसार मैं
छोरे की कदर घनी सै छोरी पराया धन परिवार मैं
छिना झपटी बढ़ती जावें ये छपती रोज अखबार मैं
मानस खानी म्हारी व्यवस्था लादे बोली सरे बाजार मैं
कति छांट कै चलायी सै महिला भ्रूण पै कटारी हे ॥
इस व्यवस्था मैं मुठ्ठी भर तो हो घने मालामाल रहे
ईसा जाल पूर  दिया इसनै चला अपनी ढाल रहे
सोच समझ कै बढ़ियो आगै माफिया कसूते पाल रहे
फ़ौजी और पुलिशिया रणबीर कर इनकी रूखाल रहे
सही सोच के संघर्ष बिना इब जनता पिटती जारी हे ॥

Monday, 18 August 2014

shayari

रोने से किसी को कभी पाया नहीं जा सकता
खोने से किसी को भुलाया नहीं जा सकता
वक्त तो  मिलता है जिंदगी बदलने के लिए
मगर जिंदगी छोटी है वक्त बदलने के लिए


आज रास्ते बदल लिए मौका परस्ती दिखलाई
पन्द्रह साल तक तुमने कदम से कदम  मिलाई
चुनौती ज्यादा गंभीर आज जब सामने है आयी
भूल गए वो इंकलाबी नारे नकली कुर्सी है भाई


इंकलाब छुपा रखा है  इन पलकों मे ही
पर इनको ये बताना ही  तो नहीं आया,
संकट के वक्त लाल हो जाती ऑंखें पर ,
गरीब का दर्द दिखाना ही तो  नहीं आया


ये रिश्ते काँच की तरह होते है,
 टूट जाए तो चुभते है अंदर तक 
इन्हे संभालकर हथेली पर यारो 
क्योकि इन्हे टूटने मे एक पल
और बनाने मे बरसो लग जाते हैं 

एक क्रोधित  हुए दिल का  आगाज़ मुझे कहिए
सुर जिसमें सब क्रान्ति के, वो साज़ मुझे कहिए
मैं कौन हूँ क्या हूँ  मैं किसके लिए ज़िंदा हूँ यारो 
वंचित और दमित की एक आवाज  मुझे कहिए.


साम्राज्यवाद के निशाने पै, युवा लड़के और लड़की।

वार्ता : बबली और चमेली एक दिन आपस में बातें कर रही हैं कि कैसे कालेज जाते समय वे युवाओं के गैंगों की शिकार होती हैं। रोहतक और उसके आसपास के जिलों का युवा दर्शन और भूप के गैंगों से सीधे  या वाया भटिण्डा किसी किसी रूप में जुड़ गया है। लड़कियां भी इन गैंगों की सम्पतियों के रूप में देखी जाने लगी हैं। हिंसा के साथ सैक्स की पतनशील संस्कृति ने भी हाथ मिला लिया है। इन दोनों का साथ दारू, सुल्फा स्मैक पूरी तरह से निभा रही है। चमेली ने कहीं पढ़ा कि इन तीनों चीजों के सहारे अमरीका पूरी दुनियाभर पर राज करना चाहता है और चमेली बबीता को क्या बताती है भला :
साम्राज्यवाद के निशाने पै, युवा लड़के और लड़की।
बेरोजगारी हिंसा और नशा, घण्टी खतरे की खड़की।।
1.            इन बातां तै ध्यान हटाकै, नशे का मन्तर पकड़ाया
               लड़की फिरती मारी-मारी समाज यो पूरा भरमाया
               ब्यूटी कम्पीटीशन कराकै, देर्इ लवा देश की दुड़की।।
2.            निराशा और दिशाहीनता देवैं चारों तरफ दिखार्इ
               बात-बात पै हर घर के माह, माचरी खूब लड़ार्इ
               सल्फाश की गोली खाकैं, करैं जीवन की बन्द खिड़की।।
3.            युवा लड़की की ज्यान पै शांका, घणा कसूता छाया
               रोज हिंसा का शिकार बणैं, ना सांस मोह सुख का आया
               वेश्यावृत्ति इसी फैलार्इ, जणू जड़ ये फैली बड़की।।
4.            एक तरफ सै चक्का चौंध , यो दूजी तरफ अंधेरा
               दिन पै दिन बढ़ता है संकट, ना दिखै कोए सबेरा
               रणबीर सिंह विरोध , करो तुम बाजी लाकै धड़की।।