Thursday, 6 October 2016

हरियाणा स्वास्थ्य क्षेत्र का 50 साल का सफर 

अपने हाथ कलम पकड़ो

अपने हाथ कलम पकड़ो 
चालाक आदमी फैयदा ठारे , इब माणस की कमजोरी का 
घर की खांड किरकरी लागे , कहैं गूड़  मीठा चोरी का
भगत और भगवान के बीच , दलाल बैठगे आकै 
एक दूसरे की थाली पै , यें  राखें नजर जमाकै 
सीधी साच्ची बात करैं ना , यें करते बात घुमाकै 
झोटे जैसे पले पड़े  यें , सब माल मुफ्त का  खा कै 
म्हारी जेब पै बोझ डालते , अपनी जीभ चटोरी  का||
हम बैठे भगवान भरोसे , ये कहरे हम दुःख दर्द हरैं
यें मंदिर की ईंट चुरा कै अपने घर की नीव धरैं  
सारा बेच चढ़ावा खाज्याँ टीका  लाकै ढोंग करैं 
आप सयाने हम पागल बनाये , पाप करण तैं नहीं डरें
म्हारी राह मैं कांटे बोये , यें फैयदा ठारे  धौरी का  ||
राम के खातर खीलां फीकी ,यें काजू पिसता खावें
भगवान के ऊपर पंखा कोनी , यें ए सी मैं रास रचावें 
मुर्गे काट चढ़ा पतीली , यें निश दिन छौंक लगावें 
रिश्वत ले कै राम जी की , यें भगतों तैं भेंट करावें 
बड़े बड़े  गपौड़ रचें , यें करते काम टपोरी का ||
यें व्रत करारे धक्के तैं , धर्म का डर बिठा कै 
खुद पड़े पड़े हुक्म चलावें म्हारी राखें  रेल बना कै
टीके लाकै पोथी बांचें , कई राखें झूठे ढोंग रचा कै 
'रामेश्वर ' सब अँधेरा मेटो , थाम तर्क के दीप जला कै 
अपने हाथ कलम पकड़ो , लिखो  अंत इस स्टोरी का ||

Sunday, 2 October 2016

निचोड़ हो लिया

निचोड़ हो लिया
सफ़दर जी की हत्या से निचोड़  हो लिया
हुया  हड्खाया राजवर्ग यो तोड़ हो लिया
एक जनवरी साल नवासी मोटा चाला होग्या
हुया हमला सफ़दर ऊपर घायल कुढाला होग्या
हमलावर खुद राज करनीये खुल्ला पाला होग्या 
सफ़दर के नाटक का ढंग योतै  निराला होग्या  
यो राजनीती और हत्या का गठजोड़ हो लिया ||
चारों कूट मैं शोक फैलग्या कूकी दुनिया सारी 
गाँव गाँव और शहर शहर मैं  दुखी हुए नर नारी    
पैरिस लन्दन रोम के अन्दर सदमा था बड़ा भरी
कलाकार था जग मैं नामी थी संस्कृति प्यारी 
यो सरकारी चिलत्तर का भन्दा फोड़ हो लिया || 
 सफ़दर हाश्मी डस लिया सर्प राज का काला है
अभिव्यक्ति की आजादी का इब तक यो टाला है
राजवर्ग की भाषा बोलो वर्ना मुंह पर  ताला है
साच पर से जो पर्दा ठावै उसी ज्यान का गाला है
राजवर्ग सारी जगह का दीखे एक औड हो लिया ||
जल्दी संभलो रचना कारो कला पर यो हमला है
जन पक्ष की कला हमारी ना बिल्कुल ये अबला है  
रोंदना चाहते हो तुम  जैसे करता हाथी पगला है
हबीब भारती विचार करों  क्या कदम हमारा अगला है
वर्ग लुटेरा हत्यारा यो एक ठयोड़  हो लिया ||

Saturday, 1 October 2016

नारी


मानस तो बनै बिचारा कहैं  बीघनों  क़ी जड़ नारी 

बतावें वासना छिपाने को चोट कामनी क़ी हो न्यारी 
योग ध्यान करनीया  नारद पूरा योगी गया जताया  
विश्व मोहिनी पै गेरी लार काया मैं काम जगाया 
पाप लालसा डटी ना उसकी मोहिनी का कसूर बताया 
सदियाँ होगी औरत उप्पर हमेशा यो इल्जाम लगाया 
आगा पाछा देख्या कोन्या सही बात नहीं बिचारी ||
कीचक बी एक हुआ बतावें विराट  रूप का साला 
दासी बणी द्रोपदी पै दिया टेक पाप का छाहला 
अपनी बुरी नजर जमाई करना चाहया मुंह काला 
भीम बलि नै गदा उठाई जिब देख्या जुल्म कुढाला
सारा राज पुकार उठया था नौकरानी क़ी अक्कल मारी ||
पम्पापुर मैं रीछ राम का एक बाली बेटा होग्या रै 
सुग्रीव क़ी बहु खोस लई बीज कसूते बोग्या रै 
गेंद बना दी जमा बीर क़ी उसका आप्पा खोग्या रै 
ज़मीन का हक़ खोस लिया मोटा रास्सा होग्या रै 
सबते घनी सताई जावै घर मैं हो चाहे कर्मचारी ||
पुलस्त मुनि का पोता हांगे मैं पूरा मगरूर था 
पंचवटी तैं  सीता ठा कै   घमंड नशे मैं चूर था 
सीता बणी कलंकिनी थी धोबी का वचन मंजूर था 
उर्मिला का तप फालतू था जिकरा चाहिए जरूर था 
झूठी श्यान क़ी बाली चढ़ाई रणबीर या सबला नारी ||
     

Friday, 30 September 2016

NO ONE HARYANA


दुनिया रूक्के देरी हरयाणा घनी तरक्की करग्या रै ||
सब चीजां के ठाठ लग्गे कोठा नाज का भर ग्या   रै|| 
जीरी गिन्हूं कपास अर इंख की खेती बढती जावै सै 
देश के सुब्याँ मैं नंबर वन यो  हरयाणा का आवै सै 
सड़क पहोंचगी सारै गाम गाम बिजली लसकावै    सै 
छैल गाभरू छोरा इसका लड़न  फ़ौज के म्हें जावै सै 
खेतां के म्हें नया खाद बीज ट्रेक्टर घराटा ठावै सै  
फरीदाबाद  सोनीपत  हिसार पिंजौर मील सिटी लावै सै  
सारे भारत मैं भाइयो इंका सूरज शिखर मैं चढ़ग्या रै ||
ये बात तो भाई हर रोज बता बता दिल डाटे जाँ रै 
इस चकाचौंध के पाछै सै घोर अँधेरा नाटें जाँ रै  
जो भी हुआ फायदा बेईमान आपस मैं बांटें जाँ रै 
भका भका जातां के चौधरी नाड़ म्हारी काँटें जाँ रै 
अपनी काली करतूतां नै जात के तल्ले ढान्पें  जाँ रै 
बोलै जो उनके खिलाफ वे झूठे केसां  मैं फांसे  जाँ रै  
कुछ परवाने भाइयो फिर भी  इनके करतब नापें  जाँ रै 
बिन धरती अर दो किल्ले आला ज्यां तैं मरग्या रै ||
खम्बे मीटर गाम गाम मैं बिजली के इब तार गए 
ओवर सीयर एस सी सब कर बंगले अपने त्यार गए 
चार पहर भी ना बिजली आवै बाट देख देख हार गए 
बिना जलाएं  बिजली के बिल कर कसूती मार गए  
ट्यूबवेल कोन्या चालै ट्रानस्फोर्मार के जल तार गए 
पैसे आल्यां  के ट्यूबवेल थ्रेशर चल धुआं धार  गए 
गरीबां की गालाँ मै दूना कीचड देखो आज भरग्या  रै  ||
गाम गाम मैं सड़क बनाई फायदा कौन उठावैं सें 
बस आवै जावै कदे कदे लोग बाट मैं मुंह बावैं  सें
पैसे आल्यां  के छोरट  ले मोटर साईकिल धूल उड़ावें सें 
टरैक्टर ट्राली सवारी ढोवें मुंह मांगे किराये ठहरावै सें 
सड़क टूटरी  जागां  जागां साईकिल मैं पंकचर हो ज्यावें  सें 
रोड़ी फ़ोडै  पां गरीबां के जो मजबूरी मैं पैदल जावैं सें 
बस नै रोकें कोन्या रोकें तो भाडा गोज नै कसग्या रै ||
बिन खेती आल्यां  का गाम मैं मुश्किल रहना  होग्या
मजदूरी उप्पर चुपचाप  दबंगा का जुल्म सहना होग्या 
चार छः  महीने खाली बैठ पेट की गेल्याँ फहना होग्या 
चीजां के रेट तो बढ़गे प़र पुराने   प़र बहना  होग्या 
फालतू मतना मांगो  नफे  दबंग का नयों  कहना होग्या 
गाम छोड़ शहर पडे आना घर एक तरियां ढहना होग्या 
भरे नाज के कोठे फेर भी पेट कमर कै मिलग्या   रै  ||
खेती करणिया  मैं भी लोगो जात कारगर वार करै 
एक जागां बिठावै  गरीब अमीर नै ना कोए विचार करै 
किसान चार ठोड बँट लिया कैसे नैया इब पार तिरै  
ट्रैक्टर आले  बिना ट्रैक्टर आल्यां  की या  लार फिरै 
इनकी हालत किसी होगी बिलखता यो  परिवार फिरै 
बिना धरती आल्यां का आज नहीं कोए भी एतबार करै  
जात मैं जमात पैदा होगी बेईमान नै खतरा बधग्या रै ||
घन्याँ की धरती लाल स्याही मैं बैंक के महां चढ्गी थी
दो लाख मैं बेच किल्ला चेहरे की लाली  सारी झडगी  थी 
चूस चूस कै खून गरीब का अमीर के मुंह लाली बढगी थी 
कर्जे माफ़ होगे एक ब़र तो फेर कीमत  धरती की बधगी थी 
आगे कैसे काम चलैगा रै   एक ब़रतो इसतैं सधगी थी   
आगली पीढ़ी  के करैगी म्हारी तै क्यूकरै ए  धिकगी थी 
हँसना गाना भूल गए जिन्दा रहवन का सांसा पड़ग्या रै|| 
शहरों का के जिकरा  करूँ  मानस आप्पा भूल रहया यो 
आप्पा धापी माच रही आज पैसे के संग झूल रहया यो  
याद बस आज रिश्वत खोरी  जमा नशे मैं टूहल रहया यो 
इन्सान तै हैवान बनग्या  मिलावट में हो मशगूल रहया यो 
चोरी जारी ठगी बदमाशी सीख भूल सब उसूल रहया यो 
इसी तरक्की कै लागै  गोली पसीना बह फिजूल रहया यो 
फेर   भी रुके मारे तरक्की के कलम  लिखना बंद करग्या रै || 

बख्त पुगाऊँ मैं


कहानी घर घर की--नौकरानी की नजर से  अपने पति को संबोधन 
मरे गरीबी के बोझ तलै , तेरी बी ना कोए पार चलै  
अमीरी हमनै रोज छलै , शरीर  को कसूत सताऊँ मैं ||
दो घरों में जाकै मैं करूँ यो पूरा काम सफाई का 
एक घर डाक्टर का सै दूजा घर वकील अन्यायी का 
दोनों घरों का के जिकरा सै , मेरे पै ना कोए फिकरा सै 
ख़राब सबका जिगरा सै , पेट पकड़ बैठे दिखाऊँ मैं ||
वकील साहब की वकालत बस इसी चलती  बतावैं 
ओला बोला पीसा उन धौरे धंधा कई ढाल का चलावैं  
घर मैं पीटता  घरआली नै , बाहर देखो शान निराली नै 
बेटा ठाएँ हाँडै  दुनाली नै , के के सारी खोल सुनाऊँ मैं ||
डाक्टरनी दुखी कई बर बैठी रोंवती  वा पाई बेबे  
शौतन का दुःख झेल रही कई बै चुप कराई बेबे  
बड्डी कोठ्ठी पर दिल छोट्टे, बाहर शरीफ भित्तर खोट्टे
कुछ तो अकल के बी मोट्टे  , कई बै अंदाज लगाऊं मैं ||
घूर घूर कै देखै मने ना डाक्टर का एतबार बेबे 
उसकी आँख्यां  मैं दीखे यो शैतान हरबार बेबे 
डाक्टर का घर छोड़ दिया , तीजे घर मैं बिठा जोड़ लिया 
काढ मने यो निचोड़ लिया रणबीर यो बख्त पुगाऊँ मैं ||

Wednesday, 21 September 2016

भाजपा और सरकार


बढ़ा महंगाई लूट मचावै, जात धर्म पर लड़वावै
भाई चारा तोड़या चाहवै,चटा जनता नै धूळ रही।।
अम्बानी और अडाणी की मातहत है सरकार म्हारी
ठेकेदारी प्रथा बढ़ा बढ़ा कै जनता की खाल उतारी
कह कै आछे दिन भकारी, नफरत घणी ए फैलारी
बदेशी कंपनी सिर चढ़ारी, तोड़ देश के असूल रही ।।
भ्रष्टाचार बढ़ता जावै व्यापम घोटाला देखो आज
अध्यादेश चौथी बरियां ल्या करै चाला देखो आज
महिला पै करैं थानेदारी, कर कर फरमान जारी
रूढ़िवाद की बणी प्रचारी, पकड़ बात ये तूल रही।।
विकास जनता का कहते तिजूरी भरैं अम्बानी की
सब्सिडी खत्म गरीबों की , बढ़ा दई अडाणी की
दलित पर बढ़ मार रही, महिला खड़ी पुकार रही
बढ़ क्यों अत्याचार रही, राज नशे मैं टूहल रही।।
आच्छे दिनों का सपना के बेरा कित खोग्या रै
मजदूर किसान कर्मचारी घणा दुखी होग्या रै
बरोने आला रणबीर रै, लिखता सही तहरीर रै
मामला घणा गंभीर रै, भाई चारा जमा भूल रही ।।

Saturday, 17 September 2016

अंध विश्वास

भक्षक बणकै रक्षक आगे देश का सत्यानाश होवैगा ||
आस्था के नाम के उप्पर अंध विश्वास इतिहास होवैगा ||
डैमोक्रेसी म्हारी पै कसूता हमला बोल दिया भारत मैं 
बिदेशी पूँजी ताहिं दरवाजा पूरा खोल दिया भारत मैं 
मिलिटरी अड्डा बण्या भारत मुश्किल अहसास होवैगा ॥ 
आस्था के नाम के उप्पर अंध विश्वास इतिहास होवैगा ॥  
विकास का नारा लाया मीडिया खरीद लिया पूरा देखो 
अमीरां आगे टेक दिए गोड्डे किसान बनाया जमूरा देखो 
मारा मारी और महंगाई बढी यो मुश्किल विस्वास होवैगा ॥ 
आस्था के नाम के उप्पर अंध विश्वास इतिहास होवैगा ॥  
बहुविविधता हिंदुस्तान की पै या तलवार  लटका दई 
बीफ गऊ और गीता ऊपर देश की जनता भटका दई
कश्मीर भी  पढण बिठा दिया यो और बदहवास होवैगा ॥ 
आस्था के नाम के उप्पर अंध विश्वास इतिहास होवैगा ॥  
सामाजिक सुरक्षा की धज्जियाँ हर रोज उडन लाग रही 
महिला अत्याचार बढे देखो दलित कै आ रोज झाग रही 
रणबीर बरौने आला कहै हावी समाज पै बदमाश होवैगा ॥ 
आस्था के नाम के उप्पर अंध विश्वास इतिहास होवैगा ॥ 

Wednesday, 14 September 2016

भगत सिंह हर के सपने


जिन सपन्यां खातर फांसी टूटे हम मिलकै पूरा करांगे ।।
उंच नीच नहीं टोही पावै इसे समाज की नींव धरांगे।।
सबको मिलै शिक्षा पूरी यही तो थारा विचार बताया
समाज मैं इंसान बराबर तमनै यो प्रचार बढ़ाया
एक दूजे नै कोए ना लूटै थामनै समाज इसा चाहया
मेहनत की लूट नहीं होवै सारे देश मैं अलख जगाया
आजादी पाछै कसर रैहगी हम ये सारे गड्ढे भरांगे।।
फुट गेरो राज करो का गोरयां नै खेल रचाया था
छूआ छूत पुराणी समाज मैं लिख पर्चा समझाया था
समाजवाद का पूरा सार सारे नौजवानों को बताया था
शोषण रहित समाज होज्या इसा नक्शा चाहया था
थारे विचार आगै लेज्यावांगे हम नहीं किसे तैं डरांगे।।
नौजवानो को भगत सिंह याद आवै सै थारी क़ुरबानी
देश की खातर फांसी टूटे गोरयां की एक नहीं मानी
देश की आजादी खातर तकलीफ ठाई थी बेउन्मानी
गोरयां के हाथ पैर फूलगे जबर जुल्म करण की ठानी
क्रांतिकारी कसम खावैं देश की खातर डूबाँ तिरांगे।।
बहरे गोरयां ताहिं हमनै बहुत ऊंची आवाज लगाई
जनता की ना होवै थी सुनायी ज्यां बम्ब की राह अपनाई
नकाब फाड़ना जरूरी था गोरे खेलें थे घणी चतुराई
गोरयां की फ़ौज म्हारी माहरे उप्पर करै नकेल कसाई
रणबीर कसम खावां सां चाप्लूसां तैं नहीं घिरांगे।।

निभाई

आज ही शहीद भगत सिंह पर रचित एक रागनी::
भगतसिंह नै अपनी निभाई ईब हम अपनी निभावांगे ।।
इंसानियत का विचार उनका पूरी दुनिया मैं पहोंचावांगे।।
इंसानियत भूलकै समाज हैवानियत कान्ही चाल पड़या
शोषण रहित समाज का सपना चौराहे पै बेहाल खड़या
थारा संगठन जिस खातर लड़या उस विचार का परचम फैहरावांगे।।
तेईस साल की कुल उम्र चरों कान्ही तैं इतना ज्ञान लिया
बराबर हों इंसान दुनिया के मिलकै तमनै ब्यान दिया
मांग महिला का सम्मान लिया थारी क्रांति का झंडा लैहरावांगे।।
हंसते हंसते फांसी चूमगे इंकलाब जिंदाबाद का नारा लाया
बम्ब गैर कै एसैम्बली मैं नारा अंग्रेजां कै था याद दिलवाया
मिलकै सबनै प्रण उठाया गोरयां नै हम बाहर भजावांगे।।
जेल मैं पढी किताब के थोड़ी नोट किया सब डायरी मैं
आतंकवादी का मतलब समझां फर्क समझां क्रांतिकारी मैं
कहै रणबीर बरोने आला घर घर थारा सन्देश लेज्यावांगे।।
11.9.2016

एक शर्त

भगत सिंह ने आखिरी ख़त में अपने मन के विचार किस प्रकार से 
रखे एक रागनी के माध्यम से कवि ने क्या बताया भला :
टेक:
एक शर्त पर रहूँ जिन्दा देश मैं घूमूं आजादी तैं पूरी।।
पाबंदी ना लगै कोए बचाऊँ देश नै बर्बादी तैं जरूरी।।
1
हम क्रांतिकारी प्रतीक बने आज हिंदुस्तानी क्रांति के
क्रांतिकारी आदर्श आगै ल्यागे छोड्डे ना छोर कोए भ्रान्ति के
आदर्श रैहकै फांसी टूटूं जरूरी इसमें ना कोय गरूरी।।
2
जिन्दा रहया तो इतना ऊंचा हरगिज मैं नहीं रैह पाऊँगा
जो मेरे भीतर की कमजोरी उणनै कितने दिन छिपाऊँगा
साहमी आगी तो जनता तैं बनै क्रांति प्रतीक की दूरी।।
3
फांसी चढ़ने की सूरत मैं माताएं बालकां नै बतावैंगी
भगत सिंह बणिये बेटा बढ़ती कतार नहीं थम पावैंगी
इतने क्रांतिकारी हों पैदा गोरयां नै हो जाने की मजबूरी।।
4
न्यों लिख्या ख़त मैं काम मानवता का बाकी रैहग्या दखे
आजादी तैं जिन्दा रैह पाता तो मैं पूरा करता कैहग्या दखे
रणबीर उस पल की बाट कैहग्या चढ़ावै सै शरूरी।।

भगत सिंह तेईस साल का

भगत सिंह तेईस साल का यो नौजवान हुया क्रांतिकारी।।
इंकलाब जिंदाबाद नारा लाया कांपी गोरी सरकार सारी।।
नौजवान सभा बनाकै सारे क्रन्तिकारी एक मंच पै आये 
गोरयां की गुलामी खिलाफ पूरे देश मैं अलख जगाये 
आजाद राजगुरु सुखदेव पड़े थे गोरयां पै भारी।1।
गोरयां नै आतंकवादी ये सारे क्रांतिकारी बताये दखे
म्हारी आजाद सरकारां नै नहीं ये इल्जाम हटाये दखे
देखी म्हारी सरकारां की आज पूरे देश नै गद्दारी।2।
फांसी का हुक्म सुनाया सारे देश नै विरोध करया था
यो विरोध देख कसूता अंग्रेज बहोत घणा डरया था
एक दिन पहलम फांसी तोड़े जनता नै भरी हूंकारी ।3।
इंसानी समाज का सपना भगत सिंह हर नै लिया यो
गोरे गए ये देशी आगे सपन्यां पै ध्यान नहीं दिया यो
कहै रणबीर बरोने आला म्हारै थारी याद घणी आरी ।4।

चोट

चोट
या चोट मनै ,गई घोट मनै,गई फिरते जी पै लाग
ईब खेलूं मैं खूनी फाग।।
चाला होग्या गाला होग्या क्यूकर बात बताऊँ बेबे
इज्जत गंवाई चिंता लाई क्यूकर ज्यान बचाऊँ बेबे
डाकू लुटेरे फिरैं घनेरे क्यूकर गात छिपाऊं बेबे
देख अकेली करी बदफेली क्यूकर हालात बताऊँ बेबे
ना पार बसाई नहीं रोटी भाई मेरै सुलगै बदन मैं आग
ईब मैं खेलूं खूनी फ़ाग ।।
के बुझेगी भाण राहन्दे काटूँ दिन मर पड़कै हे
दिन रात परेशान हुई मैं रोऊं कोठे मैं बड़कै हे
बात बणी घणी कसूती मेरे भीतर मैं रड़कै हे
रामजी किसा खेल रचाया सोचूँ खाट मैं पड़कै हे
ये उल्टा धमकावैं मनै कुलटा बतावैं उसनै कहैं ये बेदाग
ईब मैं खेलूं खूनी फ़ाग ।।
जिस देश मैं नहीं करते सही सम्मान लुगाई का
उस देश का नाश लाजमी जड़ै अपमान लुगाई का
सारी उम्र भज्या रामजी नहीं भुगतान दुहाई का
घणा अष्टा बना दिया सै यो इम्तिहान लुगाई का
मैं तो मरली दिल मैं जरली ल्याऊं नाश जले कै झाग
ईब मैं खेलूं खूनी फाग।।
राम गाम सुनता होतै हम कति ज्यान तैं मरली
औरत ईब्बे और सताई जा या मेरे दिल मैं जरली
सबला लूटी अबला लूटी बना दासी घर मैं धरली
इबै तो और सहना होवैगा रणबीर के इतने मैं सरली
होंठ सीऊं कोण्या चुप जीऊँ कोण्या तेरा करूं सामना निर्भाग
ईब मैं खेलूं खूनी फ़ाग ।।

महिला समिति

महिला समिति की महिलाएं अपनी मांगों के लिए डी. सी.की कोठी
 पर धरना देती हैं । उनकी नेता भरतो को बुलाने आती हैं ।भरतो 
तैयार होकर चलती है तो मौजी उसका पति पूछता है कहाँ जा रही
 हो। भरतो इस सवाल जवाब में क्या कहती है भला:
मौजी:
तैयारी करकै कित चाली यो बालक इब्बे याणा सै।।
भरतो: 
महिला समिति का धरणा उसके म्हं मनै जाणा सै।।
मौजी:
इबकी गई कद आवैगी यो खाणा किन्नै बनाणा सै।।
भरतो:
रोटी पोकै धरदी मनै बस घाल कै तनै खाणा सै।।
मौजी:
के काढैगी धरने पै ये उल्टी सीख सिखावैं सैं
या राही तो ठीक नहीं तनै इसपै कौन ले ज्यावैं सैं
मनै नहीं बेरा लाग्या कौन ये पाठ पढ़ावैं सैं
पाछले दो मिहने होगे बढ़ चढ़ कै बात बणावैं सैं
घरां रैहना जरूरी तेरा हमनै टूर पै जाणा सै।।
भरतो:
सारी उम्र मैं मेरा तो पहला बुलावा आया यो
महिला समिति बणी सै उसनै कदम उठाया यो
औरत नै जागना चाहिए पूरी ढालाँ समझाया यो
बिजली पाणी की खातर धरणा आज लगाया यो
इतनी सी मोहलत दे दे मनै तो वचन पुगणा सै।।
मौजी:
दिल की बूझै मेरी तो आछी लागी ये बात नहीं
कित धक्के खावैगी तों पहचानै क्यों औकात नहीं
न्यों घर छोड़ कै जाणा दीखै आछी शुरुआत नहीं
कहण मानले यो मेरा बस इतना ही समझाणा सै।।
भरतो:
कई पढी लिखी ये बेबे बढ़िया बात बतावैं सैं
बीर नै आगै आणा चाहिए इस तरियां समझावैं सैं
बीर मर्द नै ये गाड्डी के पहिये दो दिखावैं सैं
घर का संकट कम होज्या न्यों धरणा आज लगावैं सैं
रणबीर सिंह संग मिलकै घर घर अलख जगावैं सैं ।।

Tuesday, 13 September 2016

देखियो के होगा

वार्ता : एक दिन चाँदकौर खरखौदे से बच्चों के लिए कुछ सामान
लेने गई तो वहाँ पर चर्चा थी डब्ल्यू टी ओ की। एक थ्री व्हीलर में
 माइक पर कहा जा रहा था - किसान सभा की तरफ से जलसा
 होगा जिसमें डब्ल्यू टी ओ पर बातचीत रखी जायेगी। वहां माइक
 पर चांदकौर ने एक गीत भी सुना जिसके बोल थे:
डब्ल्यू टी ओ नै म्हारे देश के कति बिगाड़े हाल,
देखियो के होगा।।
म्हारे खेत उजाड़ दिए और किसान मार दिया धरती कै
बिकवा खिड़की किवाड़ दिए दिवाला पिटग्या सरती कै
किसान छोडे ना किसे दीन के इसी बिगाड़ी चाल
देखियो के होगा।।
कमाँ कमाँ कै खेतां मैं मर लिए लूट कै पैप्सी कोला लेग्या
पलंग  निवारी देऊँगा कैहकै यो खोस म्हारा खटोला लेग्या
दो किल्ले आला जकड़ दिया बिछाकै इसनै जाल
देखियो के होगा ।।
भारत की सरकार पसार रही अमरीका आगै झोली देखो
इसे चश्में चढ़ाये अमरीका नै ना दीखै उसकी रोली देखो
डब्ल्यू टी ओ नै पाड़ लिए म्हारे सिर के सारे बाल
देखियो के होगा।।
कपास पीटी धान पीट दिया गेहूं पिटण की बारी सै
नौकरी खोसी धंधे चौपट हमला इसका भारी सै
रणबीर सरकार नै गोड्डे टेके बणगी जमा दलाल
देखियो के होगा ।।

ईब मैं खेलूं खूनी फाग।।

चोट
या चोट मनै ,गई घोट मनै,गई फिरते जी पै लाग
ईब खेलूं मैं खूनी फाग।।
चाला होग्या गाला होग्या क्यूकर बात बताऊँ बेबे
इज्जत गंवाई चिंता लाई क्यूकर ज्यान बचाऊँ बेबे
डाकू लुटेरे फिरैं घनेरे क्यूकर गात छिपाऊं बेबे
देख अकेली करी बदफेली क्यूकर हालात बताऊँ बेबे
ना पार बसाई नहीं रोटी भाई मेरै सुलगै बदन मैं आग
ईब मैं खेलूं खूनी फ़ाग ।।
के बुझेगी भाण राहन्दे काटूँ दिन मर पड़कै हे
दिन रात परेशान हुई मैं रोऊं कोठे मैं बड़कै हे
बात बणी घणी कसूती मेरे भीतर मैं रड़कै हे
रामजी किसा खेल रचाया सोचूँ खाट मैं पड़कै हे
ये उल्टा धमकावैं मनै कुलटा बतावैं उसनै कहैं ये बेदाग
ईब मैं खेलूं खूनी फ़ाग ।।
जिस देश मैं नहीं करते सही सम्मान लुगाई का
उस देश का नाश लाजमी जड़ै अपमान लुगाई का
सारी उम्र भज्या रामजी नहीं भुगतान दुहाई का
घणा अष्टा बना दिया सै यो इम्तिहान लुगाई का
मैं तो मरली दिल मैं जरली ल्याऊं नाश जले कै झाग
ईब मैं खेलूं खूनी फाग।।
राम गाम सुनता होतै हम कति ज्यान तैं मरली
औरत ईब्बे और सताई जा या मेरे दिल मैं जरली
सबला लूटी अबला लूटी बना दासी घर मैं धरली
इबै तो और सहना होवैगा रणबीर के इतने मैं सरली
होंठ सीऊं कोण्या चुप जीऊँ कोण्या तेरा करूं सामना निर्भाग
ईब मैं खेलूं खूनी फ़ाग ।।

शहीद भगत सिंह

आज ही शहीद भगत सिंह पर रचित एक रागनी::
भगतसिंह नै अपनी निभाई ईब हम अपनी निभावांगे ।।
इंसानियत का विचार उनका पूरी दुनिया मैं पहोंचावांगे।।
इंसानियत भूलकै समाज हैवानियत कान्ही चाल पड़या
शोषण रहित समाज का सपना चौराहे पै बेहाल खड़या
थारा संगठन जिस खातर लड़या उस विचार का परचम फैहरावांगे।।
तेईस साल की कुल उम्र चरों कान्ही तैं इतना ज्ञान लिया
बराबर हों इंसान दुनिया के मिलकै तमनै ब्यान दिया
मांग महिला का सम्मान लिया थारी क्रांति का झंडा लैहरावांगे।।
हंसते हंसते फांसी चूमगे इंकलाब जिंदाबाद का नारा लाया
बम्ब गैर कै एसैम्बली मैं नारा अंग्रेजां कै था याद दिलवाया
मिलकै सबनै प्रण उठाया गोरयां नै हम बाहर भजावांगे।।
जेल मैं पढी किताब के थोड़ी नोट किया सब डायरी मैं
आतंकवादी का मतलब समझां फर्क समझां क्रांतिकारी मैं
कहै रणबीर बरोने आला घर घर थारा सन्देश लेज्यावांगे।।
11.9.2016

हिटलर के तम्बू में नागार्जुन


अब तक छिपे हुए थे उनके दांत और नाखून ।
संस्कृति की भट्ठी में कच्चा गोश्त रहे थे भून।
छाँट रहे थे अब तक बस वे बड़े बड़े कानून ।
नहीं किसी को दीखता था दूधिया वस्त्र पर खून।
अब तक छिपे हुए थे उनके दांत और नाखून।
संस्कृति की भट्ठी में कच्चा गोश्त रहे थे भून।
मायावी हैं,बड़े घाघ हैं, उन्हें न समझो मन्द।
तक्षक ने सिलाए उनको 'सर्प नृत्य' के  के छंद।
अजी ,समझ लो उनका अपना नेता था जयचन्द।
हिटलर के तम्बू में अब वे लगा रहे पैबंद।
मायावी हैं, घाघ हैं, उन्हें न समझो मन्द।

हमेशा

हमने तो सहारा ही दिया हमेशा
तुमने तो उल्हाणा ही दिया हमेशा
कोई बात नहीं फितरत है आपकी
हमने तो किनारा ही दिया हमेशा

हमको मारके

हमको मारके तुम भी जिन्दा रह नहीं सकते
मगर यह सच तुम कभी कह नहीं सकते
यह मालूम तो है तुमको भी हमको भी
तुम इंसानियत के रास्ते कभी सह नहीं सकते