Wednesday, 21 September 2016

भाजपा और सरकार


बढ़ा महंगाई लूट मचावै, जात धर्म पर लड़वावै
भाई चारा तोड़या चाहवै,चटा जनता नै धूळ रही।।
अम्बानी और अडाणी की मातहत है सरकार म्हारी
ठेकेदारी प्रथा बढ़ा बढ़ा कै जनता की खाल उतारी
कह कै आछे दिन भकारी, नफरत घणी ए फैलारी
बदेशी कंपनी सिर चढ़ारी, तोड़ देश के असूल रही ।।
भ्रष्टाचार बढ़ता जावै व्यापम घोटाला देखो आज
अध्यादेश चौथी बरियां ल्या करै चाला देखो आज
महिला पै करैं थानेदारी, कर कर फरमान जारी
रूढ़िवाद की बणी प्रचारी, पकड़ बात ये तूल रही।।
विकास जनता का कहते तिजूरी भरैं अम्बानी की
सब्सिडी खत्म गरीबों की , बढ़ा दई अडाणी की
दलित पर बढ़ मार रही, महिला खड़ी पुकार रही
बढ़ क्यों अत्याचार रही, राज नशे मैं टूहल रही।।
आच्छे दिनों का सपना के बेरा कित खोग्या रै
मजदूर किसान कर्मचारी घणा दुखी होग्या रै
बरोने आला रणबीर रै, लिखता सही तहरीर रै
मामला घणा गंभीर रै, भाई चारा जमा भूल रही ।।

Saturday, 17 September 2016

अंध विश्वास

भक्षक बणकै रक्षक आगे देश का सत्यानाश होवैगा ||
आस्था के नाम के उप्पर अंध विश्वास इतिहास होवैगा ||
डैमोक्रेसी म्हारी पै कसूता हमला बोल दिया भारत मैं 
बिदेशी पूँजी ताहिं दरवाजा पूरा खोल दिया भारत मैं 
मिलिटरी अड्डा बण्या भारत मुश्किल अहसास होवैगा ॥ 
आस्था के नाम के उप्पर अंध विश्वास इतिहास होवैगा ॥  
विकास का नारा लाया मीडिया खरीद लिया पूरा देखो 
अमीरां आगे टेक दिए गोड्डे किसान बनाया जमूरा देखो 
मारा मारी और महंगाई बढी यो मुश्किल विस्वास होवैगा ॥ 
आस्था के नाम के उप्पर अंध विश्वास इतिहास होवैगा ॥  
बहुविविधता हिंदुस्तान की पै या तलवार  लटका दई 
बीफ गऊ और गीता ऊपर देश की जनता भटका दई
कश्मीर भी  पढण बिठा दिया यो और बदहवास होवैगा ॥ 
आस्था के नाम के उप्पर अंध विश्वास इतिहास होवैगा ॥  
सामाजिक सुरक्षा की धज्जियाँ हर रोज उडन लाग रही 
महिला अत्याचार बढे देखो दलित कै आ रोज झाग रही 
रणबीर बरौने आला कहै हावी समाज पै बदमाश होवैगा ॥ 
आस्था के नाम के उप्पर अंध विश्वास इतिहास होवैगा ॥ 

Wednesday, 14 September 2016

भगत सिंह हर के सपने


जिन सपन्यां खातर फांसी टूटे हम मिलकै पूरा करांगे ।।
उंच नीच नहीं टोही पावै इसे समाज की नींव धरांगे।।
सबको मिलै शिक्षा पूरी यही तो थारा विचार बताया
समाज मैं इंसान बराबर तमनै यो प्रचार बढ़ाया
एक दूजे नै कोए ना लूटै थामनै समाज इसा चाहया
मेहनत की लूट नहीं होवै सारे देश मैं अलख जगाया
आजादी पाछै कसर रैहगी हम ये सारे गड्ढे भरांगे।।
फुट गेरो राज करो का गोरयां नै खेल रचाया था
छूआ छूत पुराणी समाज मैं लिख पर्चा समझाया था
समाजवाद का पूरा सार सारे नौजवानों को बताया था
शोषण रहित समाज होज्या इसा नक्शा चाहया था
थारे विचार आगै लेज्यावांगे हम नहीं किसे तैं डरांगे।।
नौजवानो को भगत सिंह याद आवै सै थारी क़ुरबानी
देश की खातर फांसी टूटे गोरयां की एक नहीं मानी
देश की आजादी खातर तकलीफ ठाई थी बेउन्मानी
गोरयां के हाथ पैर फूलगे जबर जुल्म करण की ठानी
क्रांतिकारी कसम खावैं देश की खातर डूबाँ तिरांगे।।
बहरे गोरयां ताहिं हमनै बहुत ऊंची आवाज लगाई
जनता की ना होवै थी सुनायी ज्यां बम्ब की राह अपनाई
नकाब फाड़ना जरूरी था गोरे खेलें थे घणी चतुराई
गोरयां की फ़ौज म्हारी माहरे उप्पर करै नकेल कसाई
रणबीर कसम खावां सां चाप्लूसां तैं नहीं घिरांगे।।

निभाई

आज ही शहीद भगत सिंह पर रचित एक रागनी::
भगतसिंह नै अपनी निभाई ईब हम अपनी निभावांगे ।।
इंसानियत का विचार उनका पूरी दुनिया मैं पहोंचावांगे।।
इंसानियत भूलकै समाज हैवानियत कान्ही चाल पड़या
शोषण रहित समाज का सपना चौराहे पै बेहाल खड़या
थारा संगठन जिस खातर लड़या उस विचार का परचम फैहरावांगे।।
तेईस साल की कुल उम्र चरों कान्ही तैं इतना ज्ञान लिया
बराबर हों इंसान दुनिया के मिलकै तमनै ब्यान दिया
मांग महिला का सम्मान लिया थारी क्रांति का झंडा लैहरावांगे।।
हंसते हंसते फांसी चूमगे इंकलाब जिंदाबाद का नारा लाया
बम्ब गैर कै एसैम्बली मैं नारा अंग्रेजां कै था याद दिलवाया
मिलकै सबनै प्रण उठाया गोरयां नै हम बाहर भजावांगे।।
जेल मैं पढी किताब के थोड़ी नोट किया सब डायरी मैं
आतंकवादी का मतलब समझां फर्क समझां क्रांतिकारी मैं
कहै रणबीर बरोने आला घर घर थारा सन्देश लेज्यावांगे।।
11.9.2016

एक शर्त

भगत सिंह ने आखिरी ख़त में अपने मन के विचार किस प्रकार से 
रखे एक रागनी के माध्यम से कवि ने क्या बताया भला :
टेक:
एक शर्त पर रहूँ जिन्दा देश मैं घूमूं आजादी तैं पूरी।।
पाबंदी ना लगै कोए बचाऊँ देश नै बर्बादी तैं जरूरी।।
1
हम क्रांतिकारी प्रतीक बने आज हिंदुस्तानी क्रांति के
क्रांतिकारी आदर्श आगै ल्यागे छोड्डे ना छोर कोए भ्रान्ति के
आदर्श रैहकै फांसी टूटूं जरूरी इसमें ना कोय गरूरी।।
2
जिन्दा रहया तो इतना ऊंचा हरगिज मैं नहीं रैह पाऊँगा
जो मेरे भीतर की कमजोरी उणनै कितने दिन छिपाऊँगा
साहमी आगी तो जनता तैं बनै क्रांति प्रतीक की दूरी।।
3
फांसी चढ़ने की सूरत मैं माताएं बालकां नै बतावैंगी
भगत सिंह बणिये बेटा बढ़ती कतार नहीं थम पावैंगी
इतने क्रांतिकारी हों पैदा गोरयां नै हो जाने की मजबूरी।।
4
न्यों लिख्या ख़त मैं काम मानवता का बाकी रैहग्या दखे
आजादी तैं जिन्दा रैह पाता तो मैं पूरा करता कैहग्या दखे
रणबीर उस पल की बाट कैहग्या चढ़ावै सै शरूरी।।

भगत सिंह तेईस साल का

भगत सिंह तेईस साल का यो नौजवान हुया क्रांतिकारी।।
इंकलाब जिंदाबाद नारा लाया कांपी गोरी सरकार सारी।।
नौजवान सभा बनाकै सारे क्रन्तिकारी एक मंच पै आये 
गोरयां की गुलामी खिलाफ पूरे देश मैं अलख जगाये 
आजाद राजगुरु सुखदेव पड़े थे गोरयां पै भारी।1।
गोरयां नै आतंकवादी ये सारे क्रांतिकारी बताये दखे
म्हारी आजाद सरकारां नै नहीं ये इल्जाम हटाये दखे
देखी म्हारी सरकारां की आज पूरे देश नै गद्दारी।2।
फांसी का हुक्म सुनाया सारे देश नै विरोध करया था
यो विरोध देख कसूता अंग्रेज बहोत घणा डरया था
एक दिन पहलम फांसी तोड़े जनता नै भरी हूंकारी ।3।
इंसानी समाज का सपना भगत सिंह हर नै लिया यो
गोरे गए ये देशी आगे सपन्यां पै ध्यान नहीं दिया यो
कहै रणबीर बरोने आला म्हारै थारी याद घणी आरी ।4।

चोट

चोट
या चोट मनै ,गई घोट मनै,गई फिरते जी पै लाग
ईब खेलूं मैं खूनी फाग।।
चाला होग्या गाला होग्या क्यूकर बात बताऊँ बेबे
इज्जत गंवाई चिंता लाई क्यूकर ज्यान बचाऊँ बेबे
डाकू लुटेरे फिरैं घनेरे क्यूकर गात छिपाऊं बेबे
देख अकेली करी बदफेली क्यूकर हालात बताऊँ बेबे
ना पार बसाई नहीं रोटी भाई मेरै सुलगै बदन मैं आग
ईब मैं खेलूं खूनी फ़ाग ।।
के बुझेगी भाण राहन्दे काटूँ दिन मर पड़कै हे
दिन रात परेशान हुई मैं रोऊं कोठे मैं बड़कै हे
बात बणी घणी कसूती मेरे भीतर मैं रड़कै हे
रामजी किसा खेल रचाया सोचूँ खाट मैं पड़कै हे
ये उल्टा धमकावैं मनै कुलटा बतावैं उसनै कहैं ये बेदाग
ईब मैं खेलूं खूनी फ़ाग ।।
जिस देश मैं नहीं करते सही सम्मान लुगाई का
उस देश का नाश लाजमी जड़ै अपमान लुगाई का
सारी उम्र भज्या रामजी नहीं भुगतान दुहाई का
घणा अष्टा बना दिया सै यो इम्तिहान लुगाई का
मैं तो मरली दिल मैं जरली ल्याऊं नाश जले कै झाग
ईब मैं खेलूं खूनी फाग।।
राम गाम सुनता होतै हम कति ज्यान तैं मरली
औरत ईब्बे और सताई जा या मेरे दिल मैं जरली
सबला लूटी अबला लूटी बना दासी घर मैं धरली
इबै तो और सहना होवैगा रणबीर के इतने मैं सरली
होंठ सीऊं कोण्या चुप जीऊँ कोण्या तेरा करूं सामना निर्भाग
ईब मैं खेलूं खूनी फ़ाग ।।

महिला समिति

महिला समिति की महिलाएं अपनी मांगों के लिए डी. सी.की कोठी
 पर धरना देती हैं । उनकी नेता भरतो को बुलाने आती हैं ।भरतो 
तैयार होकर चलती है तो मौजी उसका पति पूछता है कहाँ जा रही
 हो। भरतो इस सवाल जवाब में क्या कहती है भला:
मौजी:
तैयारी करकै कित चाली यो बालक इब्बे याणा सै।।
भरतो: 
महिला समिति का धरणा उसके म्हं मनै जाणा सै।।
मौजी:
इबकी गई कद आवैगी यो खाणा किन्नै बनाणा सै।।
भरतो:
रोटी पोकै धरदी मनै बस घाल कै तनै खाणा सै।।
मौजी:
के काढैगी धरने पै ये उल्टी सीख सिखावैं सैं
या राही तो ठीक नहीं तनै इसपै कौन ले ज्यावैं सैं
मनै नहीं बेरा लाग्या कौन ये पाठ पढ़ावैं सैं
पाछले दो मिहने होगे बढ़ चढ़ कै बात बणावैं सैं
घरां रैहना जरूरी तेरा हमनै टूर पै जाणा सै।।
भरतो:
सारी उम्र मैं मेरा तो पहला बुलावा आया यो
महिला समिति बणी सै उसनै कदम उठाया यो
औरत नै जागना चाहिए पूरी ढालाँ समझाया यो
बिजली पाणी की खातर धरणा आज लगाया यो
इतनी सी मोहलत दे दे मनै तो वचन पुगणा सै।।
मौजी:
दिल की बूझै मेरी तो आछी लागी ये बात नहीं
कित धक्के खावैगी तों पहचानै क्यों औकात नहीं
न्यों घर छोड़ कै जाणा दीखै आछी शुरुआत नहीं
कहण मानले यो मेरा बस इतना ही समझाणा सै।।
भरतो:
कई पढी लिखी ये बेबे बढ़िया बात बतावैं सैं
बीर नै आगै आणा चाहिए इस तरियां समझावैं सैं
बीर मर्द नै ये गाड्डी के पहिये दो दिखावैं सैं
घर का संकट कम होज्या न्यों धरणा आज लगावैं सैं
रणबीर सिंह संग मिलकै घर घर अलख जगावैं सैं ।।

Tuesday, 13 September 2016

देखियो के होगा

वार्ता : एक दिन चाँदकौर खरखौदे से बच्चों के लिए कुछ सामान
लेने गई तो वहाँ पर चर्चा थी डब्ल्यू टी ओ की। एक थ्री व्हीलर में
 माइक पर कहा जा रहा था - किसान सभा की तरफ से जलसा
 होगा जिसमें डब्ल्यू टी ओ पर बातचीत रखी जायेगी। वहां माइक
 पर चांदकौर ने एक गीत भी सुना जिसके बोल थे:
डब्ल्यू टी ओ नै म्हारे देश के कति बिगाड़े हाल,
देखियो के होगा।।
म्हारे खेत उजाड़ दिए और किसान मार दिया धरती कै
बिकवा खिड़की किवाड़ दिए दिवाला पिटग्या सरती कै
किसान छोडे ना किसे दीन के इसी बिगाड़ी चाल
देखियो के होगा।।
कमाँ कमाँ कै खेतां मैं मर लिए लूट कै पैप्सी कोला लेग्या
पलंग  निवारी देऊँगा कैहकै यो खोस म्हारा खटोला लेग्या
दो किल्ले आला जकड़ दिया बिछाकै इसनै जाल
देखियो के होगा ।।
भारत की सरकार पसार रही अमरीका आगै झोली देखो
इसे चश्में चढ़ाये अमरीका नै ना दीखै उसकी रोली देखो
डब्ल्यू टी ओ नै पाड़ लिए म्हारे सिर के सारे बाल
देखियो के होगा।।
कपास पीटी धान पीट दिया गेहूं पिटण की बारी सै
नौकरी खोसी धंधे चौपट हमला इसका भारी सै
रणबीर सरकार नै गोड्डे टेके बणगी जमा दलाल
देखियो के होगा ।।

ईब मैं खेलूं खूनी फाग।।

चोट
या चोट मनै ,गई घोट मनै,गई फिरते जी पै लाग
ईब खेलूं मैं खूनी फाग।।
चाला होग्या गाला होग्या क्यूकर बात बताऊँ बेबे
इज्जत गंवाई चिंता लाई क्यूकर ज्यान बचाऊँ बेबे
डाकू लुटेरे फिरैं घनेरे क्यूकर गात छिपाऊं बेबे
देख अकेली करी बदफेली क्यूकर हालात बताऊँ बेबे
ना पार बसाई नहीं रोटी भाई मेरै सुलगै बदन मैं आग
ईब मैं खेलूं खूनी फ़ाग ।।
के बुझेगी भाण राहन्दे काटूँ दिन मर पड़कै हे
दिन रात परेशान हुई मैं रोऊं कोठे मैं बड़कै हे
बात बणी घणी कसूती मेरे भीतर मैं रड़कै हे
रामजी किसा खेल रचाया सोचूँ खाट मैं पड़कै हे
ये उल्टा धमकावैं मनै कुलटा बतावैं उसनै कहैं ये बेदाग
ईब मैं खेलूं खूनी फ़ाग ।।
जिस देश मैं नहीं करते सही सम्मान लुगाई का
उस देश का नाश लाजमी जड़ै अपमान लुगाई का
सारी उम्र भज्या रामजी नहीं भुगतान दुहाई का
घणा अष्टा बना दिया सै यो इम्तिहान लुगाई का
मैं तो मरली दिल मैं जरली ल्याऊं नाश जले कै झाग
ईब मैं खेलूं खूनी फाग।।
राम गाम सुनता होतै हम कति ज्यान तैं मरली
औरत ईब्बे और सताई जा या मेरे दिल मैं जरली
सबला लूटी अबला लूटी बना दासी घर मैं धरली
इबै तो और सहना होवैगा रणबीर के इतने मैं सरली
होंठ सीऊं कोण्या चुप जीऊँ कोण्या तेरा करूं सामना निर्भाग
ईब मैं खेलूं खूनी फ़ाग ।।

शहीद भगत सिंह

आज ही शहीद भगत सिंह पर रचित एक रागनी::
भगतसिंह नै अपनी निभाई ईब हम अपनी निभावांगे ।।
इंसानियत का विचार उनका पूरी दुनिया मैं पहोंचावांगे।।
इंसानियत भूलकै समाज हैवानियत कान्ही चाल पड़या
शोषण रहित समाज का सपना चौराहे पै बेहाल खड़या
थारा संगठन जिस खातर लड़या उस विचार का परचम फैहरावांगे।।
तेईस साल की कुल उम्र चरों कान्ही तैं इतना ज्ञान लिया
बराबर हों इंसान दुनिया के मिलकै तमनै ब्यान दिया
मांग महिला का सम्मान लिया थारी क्रांति का झंडा लैहरावांगे।।
हंसते हंसते फांसी चूमगे इंकलाब जिंदाबाद का नारा लाया
बम्ब गैर कै एसैम्बली मैं नारा अंग्रेजां कै था याद दिलवाया
मिलकै सबनै प्रण उठाया गोरयां नै हम बाहर भजावांगे।।
जेल मैं पढी किताब के थोड़ी नोट किया सब डायरी मैं
आतंकवादी का मतलब समझां फर्क समझां क्रांतिकारी मैं
कहै रणबीर बरोने आला घर घर थारा सन्देश लेज्यावांगे।।
11.9.2016

हिटलर के तम्बू में नागार्जुन


अब तक छिपे हुए थे उनके दांत और नाखून ।
संस्कृति की भट्ठी में कच्चा गोश्त रहे थे भून।
छाँट रहे थे अब तक बस वे बड़े बड़े कानून ।
नहीं किसी को दीखता था दूधिया वस्त्र पर खून।
अब तक छिपे हुए थे उनके दांत और नाखून।
संस्कृति की भट्ठी में कच्चा गोश्त रहे थे भून।
मायावी हैं,बड़े घाघ हैं, उन्हें न समझो मन्द।
तक्षक ने सिलाए उनको 'सर्प नृत्य' के  के छंद।
अजी ,समझ लो उनका अपना नेता था जयचन्द।
हिटलर के तम्बू में अब वे लगा रहे पैबंद।
मायावी हैं, घाघ हैं, उन्हें न समझो मन्द।

हमेशा

हमने तो सहारा ही दिया हमेशा
तुमने तो उल्हाणा ही दिया हमेशा
कोई बात नहीं फितरत है आपकी
हमने तो किनारा ही दिया हमेशा

हमको मारके

हमको मारके तुम भी जिन्दा रह नहीं सकते
मगर यह सच तुम कभी कह नहीं सकते
यह मालूम तो है तुमको भी हमको भी
तुम इंसानियत के रास्ते कभी सह नहीं सकते

पैर की जूती बताई महिला ----------

सारे मिलकै सोचां बैठके या सती प्रथा गल्त बताई क्यों ।।
पैर की जूती बताई महिला इंसान नहीं या दिखाई क्यों ।।
सती नहीं होंति आज कोय बी धर्म तो डूब्या कोण्या भाई
महिला के पढ़ने पर रोक सदियों से थी कहैं लगाई
राष्ट्रपति बी बनी औरत ना धर्म पै संकट छाई क्यों।।
पैर की जूती बताई महिला ----------
शुद्र पढ़ाई कै नेड़ै नहीं जावैगा ऐसा म्हारे ग्रन्थ लिखते
घर आना कूंए पै चढ़ना मना गल्ती करते तो पिटते
शुद्र की शिक्षा पर पाबन्दी धर्म ठेकेदारां नै लाई क्यों।।
पैर की जूती बताई महिला ----------
मकान मन्दिर तैं ऊंचा बनाना रिवाजों खिलाफ बताया
बड़े बड़े टावरां के मालिक आज धर्म का बीड़ा ठाया
बदलाव आये धर्मों मैं बदल की रीत बिसराई क्यों।।
पैर की जूती बताई महिला ----------
धार्मिकता और धर्मान्धता मैं फर्क समझना होगा भाई
धर्म व्यक्तिगत मसला सै तर्क समझना होगा भाई
धर्मान्धता विकास की बैरी धार्मिकता गयी दबाई क्यों ।।
पैर की जूती बताई महिला ----------

रोबसन


वो हमारे गीत क्यों रोकना
चाहते हैं
नीग्रो भाई हमारे पौल रोबसन
हम अपनी आवाज उठा रहे हैं
वो नाराज क्यों
नीग्रो भाई हमारे पौल रोबसन
वो डरते हैं जिंदगी से
वो डरते हैं मौत से
वो डरते हैं इतिहास से
वो डरते हैं रोबसन से
वो हमारे कदमों से डरते हैं
वो हमारी आँखों से डरते हैं
जनता की चेतना से डरते हैं रोबसन
वो क्रान्ति की गर्जना से डरते हैं
रोबसन, रोबसन ,नीग्रो भाई हमारे

धरती जागी चिंता खागी

रणसिंह और कमला की बातचीत 1986 -87 , के दौर में -----
रणसिंह : कुड़की आगी जर्दी छागी नाश हों मैं कसर नहीं ।।
कमला  : धरती जागी चिंता खागी डले ढोंण मैं बिसर  नहीं।।
रणसिंह : कोए मखौल उड़ावै म्हारा कसूता मारै कोए तान्ना
कोए घणी दया दिखावै कहै मत दे कोए आन्ना
दारू मैं क्यूँ पीग्या धरती सोध्या नहीं कोए रकान्ना
उल्टी सीधी चर्चा चालै नहीं ख़ाली कोए खान्ना
सुणले कमला आया हमला आज मरण मैं कसर नहीं।।
कमला :
चालीस बरस तैं देखूँ म्हारी खाल उतारी जा सै
मण्डी फेर होज्या ठंडी न्यों कमाई सारी जा सै
म्हारी कीमत दूजा लावै म्हारी अक्कल मारी जा सै
कुआँ झेरा टोहना होज्या कोण्या पार हमारी जा सै
फटे  हालां टुटी चालां होवै दिल मैं सबर नहीं ।।
रणसिंह :
 कारखाने मैं आवै टोट्टा नहीं सरकार नीलम करै
चलावैं दूनी पूंजी लाकै न्यों पूरा इंतजाम करै
चालें पाछै उल्टा देवै मालिक के गोदाम भरै
भा बी थोड़ा कुड़क धरती गेल डिफाल्टर नाम धरै
जीते कोण्या मरते कोण्या यो तो किमै बसर नहीं।।
कमला :
 क्यों माड़ा मन कररया धरती अपनी बचाणी सै
आड़ै हम ऐकले कोण्या मिलकै अलख जगाणी सै
गाम गाम कुड़की आरी सै सही गलजोट बनाणी सै
आप्पा मारें पार पड़ैगी साच्ची बात समझाणी सै
हों किसान करजवान कट्ठे और कोए तो डगर नहीं।।
रणसिंह:
आंसू आरे धीर बंधावै ईब तक हिम्मत हारी ना
कुड़की  नहीं होण दयूं कहै सस्ती लाश हमारी ना
क्यों खामखा पागल होरी जावै आज पार हमारी ना
रणबीरसिंह खड़े  लखावां बरोणा बूझै जात हमारी ना
कित सैं लाल हरियाणे के कानां गई के खबर नहीं ।।

मार महंगाई की

रणबीर एक गरीब किसान परिवार से है । दो एकड़ जमीन है। गुजारा मुश्किल से कर पाते हैं । चंदकौर वैसे तो बी ए पास है और समझदार भी  बहुत है मग़र विवाह के बाद परिवार की जिम्मेदारियों ने उसे जवान उम्र में भी ढली उम्र की महिला बना दिया है ।चारों तरफ महंगाई ने तबाही मचाई है । बच्चों की पढ़ाई महंगी , बीमारी की दवाई महंगी ।एक दिन वह बुग्गी पर खेत जाते जाते सोचने लगती है :-
टेक:  म्हारे ऊपर पड़न लागरी कसूती मार महंगाई की ।।
म्हारे सिर कै  ऊपर लटकै तलवार महंगाई की ।।
1  गरीब आदमी कित जावै क्यूकर करै गुजारा यो
गरीबों को बास्टर्ड  कहते हमतैं करैं किनारा यो
लूट लिया धन म्हारा यो बधा कै रफ़्तार महंगाई की।।
2  म्हारे देश पै पड़री सै मार अमरीका की
करनी होगी मिलकै हमनै अर्थी त्यार  अमरीका की
होज्या हार अमरीका की नहीं जावै पार महंगाई की ।।
3  राज के भूखयां नै बेच दिया सब सम्मान दखे
सिर कटवा कै भी राखां हम देश की श्यान दखे
आड़ै बढ़िया इंसान दखे रोकेंगे सरकर  महंगाई की।।
4   इस महंगाई मैं देखो यो सारा संसार करहावै सै
म्हारी किस्मत मैं लिख राख्या झूठ बहकावै सै
रणबीर सिंह समझावै सै भूंडी कार महंगाई की ।।

चूट चूट कै खागे हमनै.........

बारा बाट
 ईब होगे बारा बाट कसूते होती कितै सुनाई ना।
चूट चूट कै खागे हमनै मिलती कितै दवाई ना।
1 जिन सरमायेदारां नै गौरे झूठी चा पिलाया करते
जी हजूरी फितरत उनकी जमकै टहल बजाया करते
बड्डे चौधरी साँझ सबेरै ललकै पैर दबाया करते
राय साहब कोय सर की न्यों पदवी पाया करते
आज मालिक बने देश के समझी हमनै चतराई ना।।
चूट चूट कै खागे हमनै.........
कुल सौ बालक म्हारे देश के दो कालेज पढ़ण जावैं सैं
पेट भराई मिलै तीस नै सत्तर भूखे क्यों सो जावैं सैं
बिना नौकरी ये छोरे गाभरू आपस मैं नाड़ कटावैं सैं
काले जबर कानून बनाकै म्हारे होंठ सीमणा चाहवैं सैं
नब्बै की रेह रेह माटी देखी इसी तबाही ना।।
चूट चूट कै खागे हमनै.........
बेकारी महंगाई गरीबी तो कई गुणा बढ़ती जावैं रै
जब हक मांगें कट्ठे होकै वे तान बन्दूक दिखावैं रै
साहूकार हमनै बाँटण नै नई नई अटकल ल्यावैं रै
म्हारी जूती सिर भी म्हारा न्यों म्हारा बेकूफ बणावैं रै
थोथा थोथा पिछोड़ दे सारा छाज इसी अपनाई ना ।।
चूट चूट कै खागे हमनै.........
इतनी मैं नहीं पार पड़ी दस नै जुल्मी खेल रचाया यो
नब्बै की कड़ तोड़न खातर तीनमुहा नाग बिठाया यो
निरा देसी साहूकारा लूटै एक फण इसा बनाया यो
दूजा फन सै थोड़ा छोटा उसपै बड्डा जमींदार टिकाया यो
तीजे फन फिरंगी बैठ्या जिसकी कोय लम्बाई ना।।
चूट चूट कै खागे हमनै.........
इस तरियां इन लुटेरयां नै नब्बै हाथ न्यों बाँट दिए
लालच देकै सब जात्यां मैं अपने हिम्माती छांट लिए
उडारी क्यूकर भरै मैना धर्म की कैंची तैं पर काट दिए
हीर अर राँझयां बिचाळै देखो अखन्न काने डाट दिए
नब्बै आगै दस के करले इसकी नापी गहराई ना ।।
चूट चूट कै खागे हमनै.........
हजार भुजा की या व्यवस्था नहीं म्हारी समझ मैं आवै
एक हाथ तैं कड़ थेपड़ दे दूजे तैं गल घोटना चाहवै
करनी होगी जमकै पाले बंदी रणबीर बरोने मैं समझावै
नब्बै का जब डंका बाजै दस की ज्याण मरण मैं जावै
दस की पिछाण करे पाछै मुश्किल कति लड़ाई ना।।
1988 में छपी
1986 में लिखी थी
पेट को रोटी नहीं हाथ को काम नहीं
नयी नीतियों के आ तहे परिणाम यही